दिल्ली के इंदिरा भवन में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की करारी हार की समीक्षा के लिए बुलाई गई कांग्रेस की बैठक उस उद्देश्य से बिल्कुल उलट साबित हुई, जिसके लिए उसे आयोजित किया गया था। बिहार में कुल 61 सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई, यानी सफलता का प्रतिशत 10 प्रतिशत से भी कम रहा। इन 61 सीटों में से 37 पर उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे और करीब 18 सीटों पर कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गई। इतनी बड़ी हार के बाद पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर गलती कहां हुई, लेकिन समीक्षा बैठक में जो कुछ हुआ, उसने सवालों के जवाब देने के बजाय कांग्रेस की आंतरिक हालत को और भी ज्यादा उजागर कर दिया। बैठक शुरू होते ही जिस तरह का माहौल बना, वह किसी समीक्षा बैठक का नहीं बल्कि निजी विवाद का प्रतीत हो रहा था। वैशाली से उम्मीदवार रहे इंजीनियर संजीव और पूर्णिया के उम्मीदवार जितेंद्र यादव के बीच कहासुनी इतनी बढ़ गई कि बात गाली-गलौज से होते हुए गोली मारने की धमकी तक पहुंच गई। यह सब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के आने से ठीक पहले हुआ, लेकिन अंदर मौजूद नेताओं और बाहर इंतजार कर रहे मीडिया को यह साफ समझ आ गया कि बिहार की हार का असली कारण चुनाव मैदान नहीं, बल्कि संगठन के भीतर ही है।
बैठक में शामिल ज्यादातर उम्मीदवारों ने सबसे पहले टिकट बंटवारे पर नाराजगी जताई। कई पुराने नेताओं ने खुलकर कहा कि टिकट देते समय स्थानीय समीकरणों की अनदेखी की गई और 12 से 15 सीटों पर ऐसे लोगों को टिकट दिया गया जिनका क्षेत्र से कोई जुड़ाव ही नहीं था। यही वजह रही कि कई उम्मीदवार 5 हजार वोट भी नहीं जुटा पाए। कुछ नेताओं ने कहा कि वे महीनों से अपनी पुरानी सीट पर तैयारी कर रहे थे, लेकिन अंतिम समय में उनका टिकट बदल दिया गया, जिससे प्रचार की रणनीति पूरी तरह गड़बड़ा गई। एक उम्मीदवार ने यह भी बताया कि उन्हें चुनाव चिन्ह मिलने में इतनी देरी हुई कि प्रचार शुरू करते-करते मतदान की तारीख आ गई और विपक्ष को पूरी बढ़त मिल गई। इसी तरह कई उम्मीदवारों ने यह आरोप भी लगाया कि महागठबंधन के भीतर तालमेल नाम की कोई चीज नहीं थी। सीटों का बंटवारा बेहद देर से हुआ और 10 से ज्यादा सीटों पर फ्रेंडली फाइट की स्थिति पैदा कर दी गई। इन सीटों पर महागठबंधन के ही दूसरे दलों के उम्मीदवार खुले तौर पर कांग्रेस को हराने में लगे रहे। कई उम्मीदवारों ने कहा कि ऐसी स्थिति में विपक्ष को हराने का सवाल ही नहीं था, नुकसान कांग्रेस का होना तय था।
कुछ नेताओं का कहना था कि अगर आरजेडी के साथ गठबंधन नहीं किया गया होता तो परिणाम इतने खराब नहीं होते। तेजस्वी यादव की टीम पर भी सवाल उठाए गए कि उन्होंने कांग्रेस को बराबरी का सहयोगी नहीं माना और कई जगहों पर कांग्रेस के प्रत्याशियों की अनदेखी की गई। मुस्लिम वोटों के बिखराव को भी हार का एक कारण बताया गया। सीमांचल के नेताओं का कहना था कि अगर ओवैसी की पार्टी को शुरुआत में ही गठबंधन में शामिल कर लिया जाता तो कम से कम 4 से 5 सीटों पर महागठबंधन को सीधा फायदा मिलता। लेकिन कांग्रेस और आरजेडी दोनों ने ही समय रहते इस पर फैसला नहीं लिया, जिसका नुकसान सीधा कांग्रेस को उठाना पड़ा। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने में उत्पन्न असमंजस ने भी मुस्लिम और युवा वोटरों को कन्फ्यूज किया और इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा।
बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने हार की असली वजहों पर चर्चा करने के बजाय केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर आरोपों की झड़ी लगा दी। अल्लावरु ने कहा कि इस चुनाव में वोट खरीदे गए और चुनाव प्रक्रिया की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। प्रदेश अध्यक्ष ने दावा किया कि एसआईआर के जरिए वोट चोरी की गई और आचार संहिता के बावजूद किसानों, महिलाओं और मजदूरों को आर्थिक लाभ देकर प्रभावित किया गया। उनका कहना था कि अगर इन गड़बड़ियों को हटा दिया जाए तो महागठबंधन का वोट प्रतिशत घटा नहीं है, इसलिए हार को राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बताया जा रहा है। लेकिन यह बात समीक्षा बैठक में मौजूद कई उम्मीदवारों को पसंद नहीं आई, क्योंकि वे चाहते थे कि पार्टी अपनी कमियों को स्वीकार करे, ना कि सारी जिम्मेदारी दूसरों पर डाले।
नेताओं की आपसी बहस और वरिष्ठ नेतृत्व का बचाव, दोनों मिलकर यह संकेत दे रहे थे कि कांग्रेस अभी भी आत्मविश्लेषण की गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं है। जब भाजपा और जेडीयू जैसी पार्टियां बूथ लेवल तक की रिपोर्ट अपने शीर्ष नेतृत्व को रोज भेजती हैं, तब कांग्रेस सालों की हार के बाद भी सिर्फ बैठकें कर रही है और हर चुनाव में वही पुरानी गलतियां दोहरा रही है। जिन नेताओं को टिकट मिला, वे नाराज थे, जिन्हें नहीं मिला, वे पार्टी से दूरी बना रहे हैं। संगठन के भीतर गुटबाजी इतनी गहरी है कि एक ही प्रदेश के दो नेता एक-दूसरे का नाम तक सुनना पसंद नहीं करते। ऐसे में चुनाव जीतने की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना ही है।
दिल्ली की समीक्षा बैठक ने यह साफ कर दिया कि कांग्रेस की हार का असली कारण मैदान नहीं, बल्कि संगठन के भीतर की टूट, टिकट वितरण का अव्यवस्थित सिस्टम, गठबंधन प्रबंधन की विफलता और नेतृत्व स्तर पर समय पर निर्णय लेने की कमी है। अगर कांग्रेस इन कमियों को नहीं सुधारती, तो आने वाले चुनावों में भी नतीजे ऐसे ही दिखेंगे। बिहार की हार जितनी बड़ी राजनीतिक चुनौती थी, उससे कहीं बड़ी चुनौती अब यह साबित हो चुकी है कि कांग्रेस अपने भीतर छिपी समस्याओं को कब और कैसे दूर करती है।
