उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में सभी राज्य सचिवालय प्रशासन को यह आदेश दिया है कि अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें अपराधी केंद्रों में रखा जाए। यह निर्देश न केवल सार्वभौमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी आवश्यक है। योगी सरकार लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को अपनी शासन व्यवस्था में सबसे ऊपर बता रही है। अब यह स्टेप उसी नीति का एक और सीक्वल के रूप में देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश, देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य, देश की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा संवेदनशील माना जा रहा है। यहां मिशिगन राज्य के रास्ते या अन्य माध्यमों से आने वाले अवैध संबंधों की संख्या पर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रहती है। हालाँकि कोई भी आधिकारिक दस्तावेज़ यह स्पष्ट नहीं करता है कि प्रदेश में अवैध घुसपैठियों का स्तर कितना बड़ा है, लेकिन केंद्र और सरकार दोनों समय-समय पर इस पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ के आदेश की औपचारिक प्रक्रिया पर गौर करें तो जिला स्तरीय को स्थानीय खुफिया इकाइयों के साथ मिलकर ऐसे एलाकों की पहचान करना है जहां शशांकित रूप से अवैध रूप से रहने वाले लोग हो सकते हैं। इसके बाद इन लोगों की नागरिकता की जांच की जाएगी, और विदेशी नागरिकों के रूप में पहचान की जाएगी, उन्हें प्रशिक्षण केंद्र में तैनात करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। वर्तमान प्रदेश में नासिक और मथुरा में डिटेंशन सेंटरों की स्थापना की जा रही है जबकि कुछ अन्य स्मारकों में भी इस दिशा में काम चल रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह कदम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा वाले सीमांकन का है। योगी आदित्यनाथ, अक्सर अपने भाषणों में बंधक बने और अवैध रोहिंग्या जैसे छात्रों को राष्ट्रीय सुरक्षा से वंचित कर रहे हैं। उनकी इस नीति का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है कि योगी सरकार प्रदेश की सीमाओं के भीतर किसी भी अवैध तत्व को नहीं देखेगी। इससे भाजपा समर्थकों की छवि मजबूत होती है कि सरकार कठोर और कठोर कार्रवाई से पीछे नहीं हटती।
हालाँकि इस फैसले की आलोचना भी हो रही है। पार्टी, विशेष रूप से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, जनता का ध्यान आर्थिक और सामाजिक पहलुओं से भटकाने की कोशिश बता रहे हैं। सूची का तर्क है कि राज्य में बेरोजगारी, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसे आंतरिक मुद्दे अधिक गंभीर हैं, जबकि सरकार ऐसे सूची में राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने यह भी कहा कि केंद्र और राज्यों को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य में वास्तव में कितने अवैध प्रवासी हैं, और उन सभी को प्रवेश की प्रक्रिया व्यवहारिक रूप से संभव है।
सामाजिक दृष्टि से यह पहले कई प्रश्न रखता है। अवैध प्रवास और नागरिकता की भयावहता अक्सर धार्मिक या जातीय पहचान से जुड़ी होती है, जिससे सामाजिक तनाव की स्थिति बन सकती है। उत्तर प्रदेश जैसे विविध मानचित्र वाले राज्य में ऐसे कारवाइयों का स्थानीय स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है। प्रशासन के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि इस प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति का निर्देश न दिया जाए। नागरिकता या पहचान की जांच एक लंबी और संकेत प्रक्रिया है, जिसमें योग्यता की कमी और त्रुटियां अक्सर विवाद का कारण बनती रहती हैं। वहीं कानूनी विशेषज्ञ का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को डिजायन सेंटर में रखने के लिए पर्याप्त प्रमाण और ठोस प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने कई बार यह भी स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न मानवाधिकारों के लिए कोई संवैधानिक दंडस्थल नहीं है। इसलिए राज्य सरकार को इस पूरी कार्रवाई को संवैधानिक प्रावधानों में रखकर, विस्तार और मानवीय दृष्टिकोण से लागू करना होगा।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो इस फैसले का संबंध साहित्य संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (दीवाना) की बहस से भी जोड़ा जा सकता है। हालांकि उत्तर प्रदेश में अभी तक सार्वभौम लागू नहीं हुआ है, लेकिन योगी सरकार का यह कदम उसी दिशा में प्रशासनिक तैयारी पर हस्ताक्षर के तौर पर देखा जा सकता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि राज्य अपनी आंतरिक सुरक्षा और संतुलन को लेकर केंद्र की नीति के बुनियादी कदम को बढ़ा रहा है। जमीनी स्तर पर, आदेश के लागू होने के बाद स्थानीय प्रशासन को कई जटिलताओं का सामना करना पड़ा। पहचानने की प्रक्रिया के लिए डेटा एकत्र करना, सत्यापन के लिए स्थानीय गुप्तचरों को शामिल करना, और अंतर्राष्ट्रीय कानून के समूहों में स्थिर कार्रवाई सुनिश्चित करना सभी काम समय और संसाधन दोनों मांगते हैं।
इसके साथ ही, निजीकरण के लिए यह नई वस्तुएँ बन सकती हैं। वे पहले भी असम और दिल्ली में डिस्पैच सेंटर नीति पर सवाल उठा रहे हैं, और उत्तर प्रदेश में भी ऐसी बीमारी की निगरानी करेंगे। यदि किसी निर्दाएश व्यक्ति को श्शुसपैठियाश के लिए नियुक्त किया गया है, तो यह मामला राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विवाद का विषय बन सकता है। कुल मिलाकर, योगी आदित्यनाथ का यह आदेश निर्बल दृढ़ता और राजनीतिक संदेश मित्रों का मिश्रण है। यह निर्णय भाजपा की सुरक्षा-सक्षमता को और मजबूत छवि प्रदान कर सकता है, लेकिन इसे लागू करने से समय समर्थन, संवैधानिकता और मानवता की बिक्री पर खरा उतरना सबसे बड़ी चुनौती होगी। भविष्य में यह कदम प्रदेश की राजनीतिक स्थिति और समाज की संरचनाओं पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
