शिक्षकों की कसौटी पर कितनी खरी उतर रही है योगी सरकार

उत्तर प्रदेश में एक ओर योगी सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र में कई नई पहल और सुधार किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक समस्याएं और चुनौतियां भी कायम हैं। राज्य का शिक्षक समुदाय संख्या, सुविधाओं, नियुक्तियों, तबादलों और गुणवत्ता सुधार सभी स्तरों पर बदलते हालातों का सामना कर रहा है।उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा 2025 में एलटी ग्रेड शिक्षकों के 7466 नए पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की गई है, जिसमें पुरुष, महिला और दिव्यांग श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित पद शामिल हैं। इस प्रकार की भर्तियों का उद्देश्य राज्य के सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में विषयवार खाली पदों को भरना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। सरकारी डेटा के अनुसार, प्रदेश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नामांकित छात्रों की संख्या 1.48 करोड़ से अधिक है, जबकि शिक्षक, शिक्षामित्र और अनुदेशक कुल 6.28 लाख से अधिक हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में लगभग 1.20 लाख शिक्षक और 25 हजार से ज्यादा अनुदेशक कार्यरत हैं।सरकार ने शिक्षकों के लिए कई सुविधाओं की शुरुआत भी की है। कुछ माह पूर्व शिक्षक दिवस 2025 के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी शिक्षकों प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, वित्तपोषित, शिक्षामित्र और अनुदेशकों को कैशलैस इलाज की सुविधा देने की घोषणा की, जिससे लगभग 9 लाख परिवार लाभान्वित होंगे। योगी सरकार शिक्षा क्षेत्र में स्वास्थ्य सुरक्षा की गंभीरता को लेकर प्रशंसा पा रही है। साथ ही शिक्षा मित्र एवं अनुदेशकों के मानदेय को बढ़ाने के लिए कमेटी भी गठित कर दी है जो जल्द अपनी रिपोर्ट देगी। इससे शिक्षकों को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर सहूलियत मिलेगी और उनके आर्थिक हालात भी सुधरेंगे।

बहरहाल, इन सकारात्मक पहलों के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। सबसे गंभीर समस्या, लगभग 1.86 लाख ऐसे शिक्षकों की है जो शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास नहीं कर सके हैं। सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2025 के आदेश के अनुसार अब इन शिक्षकों की नौकरी और पदोन्नति दोनों पर संकट खड़ा हो गया है, यदि वे दो वर्षों के भीतर टीईटी उत्तीर्ण नहीं कर पाते हैं। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर शिक्षकों के हक की रक्षा का प्रयास किया है, मगर जब तक केंद्र सरकार इस दिशा में स्पष्ट दखल नहीं करती, तब तक राहत की उम्मीद कम है। इस निर्णय को लेकर बड़ी संख्या में शिक्षक राज्य सरकार के प्रयासों के बावजूद असंतुष्ट और डरे हुए हैं। शिक्षकों ने ज्म्ज् की अनिवार्यता के विरोध में काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन भी किया है।उधर, शिक्षकों की तबादला नीति में भी बदलाव आया है। 2025 में 20,000 से अधिक शिक्षकों का स्थानांतरण किया गया है, जिसमें स्वैच्छिक आवेदनों के बाद ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत स्थानांतरण लिस्ट जारी की गई। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने में सहायता मिल रही है, लेकिन स्थानांतरण की प्रक्रिया को लेकर शिक्षकों में शंका और असंतोष की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।इसके अलावा, 2025 में एक महत्वपूर्ण मसला 69,000 सहायक शिक्षकों को कार्यमुक्त करने का रहा, जो आवश्यक योग्यताएं 2018 तक पूरी नहीं कर सके। इस फैसले ने उत्तर प्रदेश के शिक्षा जगत में काफी अशांति फैला दी। हजारों शिक्षक अनिश्चितता, आंदोलन और याचिकाओं जैसे रास्ते पर हैं, जिससे पठन-पाठन की स्थायित्वता में बाधा आई है।

नगर सीमा विस्तार के बाद कई शहरों में शहरी क्षेत्र के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी रही है। जिन ग्रामीण स्कूलों को अब नगर क्षेत्र में शामिल किया गया, वहां पर अधिकांश स्कूल शिक्षकों की मूल आवश्यकताओं से जूझ रहे हैं, जिससे छात्र-शिक्षक अनुपात लगातार बिगड़ रहा है। यही नहीं, सरकार के तमाम प्रयासों एवं नई नियुक्तियों के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता और सुविधाओं में असंतुलन की शिकायतें जारी हैं। प्रदेश सरकार की कई उपलब्धियां रही हैं,नवाचार योजनाएं, सुविधाएं और शिक्षक हित में बड़े फैसले, लेकिन चुनौतियां भी बढ़ी हैं। शिक्षकों की पदोन्नति, स्थायित्व, वेतनमान, समयबद्ध नियुक्ति और कार्य का सम्मान इन बुनियादी मुद्दों पर पूरी तरह राहत नहीं मिल सकी है। शिक्षक वर्ग अभी भी नौकरी की सुरक्षा, स्थायित्व और प्रोन्नति के स्पष्ट एवं सक्षम ढांचे की मांग करता है। वहीं, सरकार का पक्ष है कि उसने स्वास्थ्य, वेतन, नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और सुविधाजनक बनाया है, और आने वाले समय में इन समस्याओं को सुलझाने के प्रयास जारी रहेंगे।बहरहाल, प्रदेश की योगी सरकार एक ओर अपनी नीतियों से शिक्षक हित को संबोधित करती दिख रही है, वहीं शिक्षक समुदाय की जमीनी समस्याओं का समाधान एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जब तक रिक्तियों की समयबद्ध पूर्ति, टीईटी जैसी बाधाओं का न्यायसंगत समाधान, वेतन और स्थायित्व के मसले नहीं सुलझते, तब तक शिक्षकों की कसौटी पर सरकार को पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता।

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