उत्तर प्रदेश के रामपुर की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खान तथा उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान को रामपुर की एक अदालत ने सोमवार, 17 नवंबर 2025 को दो पैन कार्ड रखने के मामले में दोषी करार दिया है। इस फैसले के साथ ही पिता-पुत्र की कानूनी मुसीबतें और बढ़ गई हैं। अदालत ने दोनों को सजा तय करने के लिए अगली तारीख 20 नवंबर निर्धारित की है। यह मामला कई साल पुराना है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अब्दुल्ला आजम ने दो जन्मतिथियों के आधार पर दो अलग-अलग पैन कार्ड बनवाए थे और उम्र में अंतर दिखाकर चुनाव नामांकन के समय गलत जानकारी दी थी। इस पूरी प्रक्रिया में आजम खान पर बेटे की मदद और दस्तावेजों में गलत जानकारी देने का आरोप था।
जानकारी के अनुसार, यह मामला पहली बार 2019 में सुर्खियों में आया था, जब शेष भारतीय जनता पार्टी के नेता अखलाक अहमद ने इस मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि अब्दुल्ला आजम ने अपने जन्म प्रमाण पत्र और शैक्षिक दस्तावेजों में अलग-अलग जन्म तिथियां दर्शाईं ताकि वे जल्दी चुनाव लड़ने के योग्य हो सकें। इस दौरान जांच में पाया गया कि अब्दुल्ला के पास दो पैन कार्ड हैंकृएक में जन्म तिथि 30 जनवरी 1993 और दूसरे में 1 जनवरी 1990 दर्ज है। इस विसंगति के चलते आयकर विभाग ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने 2019 में एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और लगातार सुनवाई होती रही।
रामपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि दो पैन कार्ड रखना कानून के दायरे में अपराध की श्रेणी में आता है। अदालत ने पाया कि दस्तावेजों में जानबूझकर गलत जानकारी दी गई और यह कृत्य न सिर्फ आयकर कानून का उल्लंघन है बल्कि सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति से अपेक्षित सत्यनिष्ठा के भी विपरीत है। अदालत ने कहा कि सबूत पर्याप्त हैं और दोनों अभियुक्तों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई है। अदालत के अनुसार, ऐसे मामले में लापरवाही या अनजाने में हुई गलती की गुंजाइश नहीं है क्योंकि पैन कार्ड जैसी सरकारी पहचान के दस्तावेज अत्यंत संवेदनशील और विधिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
इस फैसले के बाद समाजवादी पार्टी के भीतर और विपक्षी राजनीति में भी हलचल देखी जा रही है। आजम खान, जो हमेशा से उत्तर प्रदेश की राजनीति में विवादों के केंद्र में रहे हैं, पहले भी कई मामलों में सजा पा चुके हैं। भूमि कब्जा, दंगा भड़काने, और शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित कई केस उन्हें जेल तक ले गए थे। अब यह पैन कार्ड प्रकरण उनके राजनीतिक करियर पर एक और दाग के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के स्थानीय नेताओं का कहना है कि आजम खान और उनके परिवार को लगातार राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार बनाया जा रहा है, जबकि भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कानून का न्याय है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
अब्दुल्ला आजम खान, जो रामपुर सीट से विधायक रह चुके हैं, अपने पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कानूनी विवादों ने उनके राजनीतिक सफर को कमजोर किया है। पहले ही उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो चुकी है क्योंकि अदालत ने उन्हें दस्तावेजों में गलत जानकारी देने का दोषी पाया था। अब दो पैन कार्ड मामले में दोष सिद्ध होने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य और दांव पर लग गया है। अगर सजा तय होने पर उन्हें कारावास की सजा मिलती है, तो यह न केवल उनकी सार्वजनिक छवि बल्कि भविष्य की चुनावी योजनाओं को भी प्रभावित कर सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि आयकर नियमों के तहत कोई भी व्यक्ति दो पैन कार्ड नहीं रख सकता। यह एक गंभीर अपराध है, जिसके लिए जुर्माना और जेल दोनों की सजा निर्धारित है। अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि इस तरह की गलती आम नागरिक से भी अपेक्षित नहीं है, फिर एक विधायक और पूर्व मंत्री के रूप में तो इसकी कोई संभावना नहीं बनती। रामपुर अदालत के फैसले के बाद यह मामला अब उच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की दिशा में बढ़ सकता है। माना जा रहा है कि आजम खान की ओर से फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की जाएगी।
राजनीतिक रूप से देखें तो यह घटना सपा और भाजपा के बीच जारी पुरानी दुश्मनी का नया अध्याय मानी जा रही है। आजम खान हमेशा भाजपा सरकार पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि उनके खिलाफ झूठे मुकदमे चलाकर उन्हें सियासी रूप से कमजोर किया जा रहा है। वहीं भाजपा नेताओं ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और कोई भी व्यक्ति अपने प्रभाव या पद के कारण बरी नहीं हो सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने रामपुर की राजनीति में फिर से सक्रियता ला दी है। स्थानीय लोगों के बीच भी इस फैसले को लेकर चर्चा गर्म हैकृकुछ इसे न्याय की जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई मान रहे हैं।असल में, आजम खान का नाम लंबे समय से विवादों से जुड़ा रहा है। चाहे वह जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन को लेकर हो या सरकारी संपत्तियों के दुरुपयोग का मामला, वे हमेशा कानूनी घेरे में रहे हैं। हालांकि अपने समर्थकों के बीच उनकी छवि अभी भी एक जुझारू और संघर्षशील नेता की है, जो सत्ता के खिलाफ बोलने से नहीं डरते। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 20 नवंबर को अदालत सजा सुनाते समय क्या फैसला देती है और यह परिवार इस नए संकट का किस तरह सामना करता है।
