बिहार की सियासत एक बार फिर बड़े मोड़ पर पहुंच गई है। दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहे मुख्यमंत्री नितीश कुमार की राजनीतिक पटकथा इस बार मतदाताओं ने पूरी तरह बदल दी है। जनता दल (यूनाइटेड) को उम्मीद थी कि उसका सामाजिक समीकरण, सुशासन का दावा और नितीश की व्यक्तिगत छवि एक बार फिर काम आएगी, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता अब बदलाव चाहती है। इस बार मतदाताओं ने नीतीश कुमार को सम्मानजनक विदाई देते हुए सत्ता के केंद्र से दूर कर दिया और साथ ही यह संदेश भी दे दिया कि अब ‘पलटूराम राजनीति’ का दौर बीत चुका है। ऐसा इसलिये होगा क्योंकि ऐसे चुनाव नतीजें आयें है कि भविष्य में जेडीयू और राजद पांच साल तक मिलकर भी सरकार नहीं बना सकते हैं।
बिहार के मतदाताओं की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि वे नेताओं के पुराने वादों और गठबंधनों के रिकॉर्ड को नहीं भूलते। नितीश कुमार लंबे समय से इस भरोसे पर राजनीति कर रहे थे कि बिहार उनकी स्थिर छवि और विकासवादी विमर्श से जुड़ा रहेगा, लेकिन बार-बार के गठबंधन बदलने से उनकी साख डगमगा गई। एक वक्त था जब उन्होंने भाजपा के सहयोग से सत्ता में मजबूती पाई, फिर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के साथ मिलकर सत्ता बनाई, और फिर से भाजपा के साथ जाकर तीसरी बार मुख्यमंत्री बन बैठे। लेकिन इस बार जनता ने साफ संकेत दिया कि ‘पलटने’ की जगह अब ‘बदलने’ की बारी है।राज्य के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी इलाकों तक जो मूड देखा गया, वह इस बार अलग था। युवा मतदाताओं में रोजगार और भविष्य की सुरक्षा का मुद्दा सबसे आगे था, जबकि किसान और मध्यवर्ग नीतियों से थक चुके थे। नितीश कुमार की सरकार अपने अंतिम कार्यकालों में जिस तरह निष्क्रिय नजर आई, उसने मतदाताओं के भीतर असंतोष को जन्म दिया। उनके पुराने सहयोगी भी इस बात से सहमत हैं कि जनता ने अब नीतीश के नाम को ‘विकल्प’ नहीं बल्कि ‘भूतकाल’ के रूप में देखना शुरू कर दिया है।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह चुनाव चेतावनी की घंटी साबित हुआ। तेजस्वी यादव भले युवा चेहरा रहें और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर उन्होंने अच्छी मुहिम चलाई, लेकिन नतीजों ने बता दिया कि जनता अब सिर्फ नारों से प्रभावित नहीं होती। राजद को सीमित सीटों पर सिमटकर रह जाना पड़ा, जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि दलित-पिछड़ा समीकरण का पुराना फार्मूला अब कारगर नहीं रहा।महागठबंधन के टूटने और बार-बार बदलते समीकरणों ने राजद को भी कमजोर बना दिया।
अब स्थिति यह है कि जदयू और राजद दोनों मिलकर भी विधानसभा में बहुमत पाने की स्थिति में नहीं हैं। यह समीकरण अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि बिहार की राजनीति दशकों से इन्हीं दो ध्रुवों पर घूमती रही है। भाजपा ने इस बार अपनी रणनीति बेहद सटीक ढंग से तैयार की। मोदी फैक्टर, संगठन की मजबूती और बूथ स्तर पर सक्रियता ने मिलकर विपक्षी खेमें को बिखेर दिया। भाजपा ने पिछले चुनावों की तुलना में न केवल अपनी सीटें बढ़ाईं, बल्कि अपने मत प्रतिशत में भी उल्लेखनीय इजाफा किया। इसने यह भी साबित किया कि बिहार में अब भाजपा अकेले अपने दम पर सत्ता का निर्णायक भागीदार बन चुकी है।इस राजनीतिक परिदृश्य का सबसे बड़ा असर नितीश कुमार की भूमिका पर पड़ा है। दशकों तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहने के बाद अब उनकी पार्टी ‘किंगमेकर’ की नहीं, बल्कि ‘सर्वाइवल’ की राजनीति करने को मजबूर है। जिन नितीश को ‘पलटूराम’ कहा जाता था, वे अब ऐसी स्थिति में हैं कि कोई भी गठबंधन उन्हें सत्ता में वापसी का रास्ता नहीं दे सकता। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह नतीजे सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक युग के अंत की घोषणा हैं।
नितीश कुमार ने अपने दौर में शिक्षा, सड़क, बिजली और शराबबंदी जैसे कई बड़े कदम उठाए। ये फैसले उन्होंने प्रशासनिक दृढ़ता के साथ लिए, लेकिन समय के साथ उनमें राजनीतिक लचीलापन इतना बढ़ गया कि जनता ने उनकी नीयत पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। जब-जब उन्होंने गठबंधन बदलकर नई सरकार बनाई, मतदाताओं के मन में यह सवाल गहराता गया कि क्या नितीश अब सिर्फ पद पर बने रहने के लिये राजनीति कर रहे हैं। इस असमंजस ने धीरे-धीरे उनकी साफ-सुथरी छवि को धुंधला कर दिया।यह भी सच है कि नीतीश कुमार के नाम पर अब भी बिहार में एक सम्मान की भावना है, लेकिन वह राजनीतिक समर्थन में तब्दील नहीं होती। लोग मानते हैं कि उन्होंने राज्य को एक दिशा दी, लेकिन अब वे थके हुए नेता हैं। राजनीति में ऊर्जा और स्थायित्व दोनों जरूरी हैं, और इस बार जनता ने इन्हीं दो पैमानों पर नीतीश को कमतर आंका।
आगामी पांच वर्षों के लिए जो राजनीतिक संकेत उभरकर आ रहे हैं, वे भाजपा और राजद के गठबंधन की मजबूती की ओर इशारा करते हैं। दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को अब यह समझ आ गया है कि पारंपरिक विरोध की राजनीति से स्थायी फायदा नहीं मिलता। सत्ता में बने रहने के लिए स्थिरता जरूरी है। मुख्यमंत्री पद का चेहरा भाजपा से हो और उपमुख्यमंत्री का पद राजद को मिले, ऐसी सहमति के संकेत सियासी गलियारों में गूंज रहे हैं। इस बार ऐसा लगता है कि यह गठबंधन पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की स्थिति में रहेगा, क्योंकि दोनों ही पक्ष जानते हैं कि टूटन की स्थिति में जनता का भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा।नितीश कुमार के लिए यह दौर खुद से मंथन का है। अगर वे राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं, तो उन्हें अब क्षेत्रीय नेता के बजाय एक वरिष्ठ मार्गदर्शक की भूमिका स्वीकार करनी होगी। बिहार की राजनीति में उनके योगदान को भले समय कभी न नकारे, लेकिन जो यथार्थ है, वह यही है कि अब सत्ता की राह उनसे दूर जा चुकी है। जनता ने साफ कह दिया है कि अब नेतृत्व की जरूरत नई पीढ़ी और नए दृष्टिकोण से होगी।
बिहार की राजनीति जिन नीतीश कुमार के नाम से एक समय स्थायित्व और समृद्धि का प्रतीक बनी थी, वही अब परिवर्तन की मांग का प्रतीक बन चुकी है। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भावनाओं के पुनरुत्थान का संकेत भी है। जनता अब नेताओं से ‘कुर्सी बदलने’ की नहीं, ‘व्यवस्था बदलने’ की उम्मीद रखती है। यह उम्मीद ही आने वाले वर्षों में राज्य की नई राजनीतिक दिशा तय करेगी।
