पढ़ी लिखी आतंकवादी जमात धर्म की आड़ में खून खराबे के साथ

भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक अदृश्य किन्तु बेहद खतरनाक सच्चाई धीरे-धीरे आकार ले रही है। यह सच्चाई यह है कि कट्टरपंथ अब किसी एक वर्ग, धर्म, या शिक्षित-अनपढ़ के दायरे तक सीमित नहीं रह गया है। समाज में अक्सर यह भ्रम रहा है कि कट्टरपंथ केवल उन तक सीमित होता है जो शिक्षा से वंचित हैं या जिन्हें आधुनिक दुनिया की समझ नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया है। अब यह साबित हो चुका है कि अनपढ़ ही नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, और बड़े प्रशासनिक या कॉर्पाेरेट पदों पर बैठे लोग भी कट्टरपंथ से प्रभावित हैं और कई बार आतंकवाद जैसी घटनाओं के सूत्रधार तक बन चुके हैं। दिल्ली के लाल किले के पास हुई आतंकवादी घटना इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। कट्टरपंथ किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता से नहीं बल्कि उसकी सोच, परवरिश और वैचारिक दिशा से जुड़ा होता है। जब किसी व्यक्ति की सोच को एकतरफा बना दिया जाता है, जब उसे यह यकीन दिला दिया जाता है कि उसका धर्म, उसका समुदाय या उसकी विचारधारा ही सर्वाेच्च है और बाकी सब गलत हैं, तब उस व्यक्ति की आलोचनात्मक सोच धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। यही वह क्षण होता है जब शिक्षा, डिग्री और पेशे का कोई अर्थ नहीं रह जाता। डॉक्टर से लेकर वैज्ञानिक तक, ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने अपनी काबिलियत को मानवता के विरुद्ध प्रयोग किया। ये लोग बमों के डिज़ाइन बनाते हैं, साइबर नेटवर्क तैयार करते हैं, और हिंसा के नए-नए तरीके खोजते हैं।

इस मानसिकता को पनपने के पीछे सिर्फ धार्मिक कट्टरता या चरमपंथी संगठन ही नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक प्रोत्साहन भी जिम्मेदार हैं। लोकतंत्र में वोट बैंक की राजनीति ने इस बीमारी को और गहरा कर दिया है। जब राजनेता वोटों के लिए किसी समुदाय या वर्ग के तुष्टीकरण में उतर जाते हैं, तो वे अनजाने में उन तत्वों को हौसला देते हैं जो समाज को बांटकर अपने एजेंडे को मजबूत करना चाहते हैं। इन लोगों को सत्ताधारी या विपक्षी कहीं से भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहानुभूति मिल जाती है। कुछ नेताओं के भाषण और बयान इस मानसिकता को खुला समर्थन देते हैं। वे कट्टरपंथ को सामाजिक असंतोष का नाम देकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि यह किसी समुदाय की भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जबकि सच्चाई यह है कि यह वास्तव में संगठित और योजनाबद्ध गतिविधि होती है।देश के भीतर फैला यह नेटवर्क बहुत ही सुनियोजित ढंग से काम करता है। तकनीकी रूप से प्रशिक्षित लोग सोशल मीडिया, डार्क वेब और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे न केवल प्रोपेगेंडा फैलाते हैं बल्कि दूसरे कट्टर विचारों से सहानुभूति रखने वालों को पहचानकर उन्हें जोड़ने का काम भी करते हैं। कोई डॉक्टर जब किसी अस्पताल में मरीजों के इलाज के साथ-साथ किसी चरमपंथी सोच के प्रचार में लगा हो, या कोई प्रोफेसर अपने छात्रों के बीच नफरत का ज़हर बोता हो, तो यह किसी समाज की सबसे भयावह विडंबना होती है। कट्टरपंथ का आकर्षण कई बार वैचारिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी होता है। कई शिक्षित लोग, जिन्होंने जीवन में सफलता हासिल की है, फिर भी अपने भीतर असफलता या असंतोष का भाव महसूस करते हैं। वे इस असंतोष की पूर्ति किसी महान उद्देश्य के नाम पर करते हैं, और यही समय होता है जब कट्टरपंथी समूह उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। उन्हें यह एहसास करवाया जाता है कि हिंसा या विनाश किसी पवित्र मकसद की पूर्ति के लिए जरूरी है। वे खुद को हीरो समझने लगते हैं, जबकि असल में वे एक विनाशकारी योजना का हिस्सा बन चुके होते हैं।

आज आतंकवाद सिर्फ सीमित इलाकों में छिपे कुछ लोगों का हथकंडा नहीं रहा। यह एक मानसिक युद्ध बन चुका है, जो सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और सरकारी दफ्तरों तक फैल चुका है। कट्टर विचारधाराओं के समर्थक अपने नए एजेंट उसी जगह खोजते हैं, जहां तर्क और विज्ञान का बोलबाला हो। उनके लिए शिक्षित दिमाग ज्यादा कारगर हथियार होता है, क्योंकि उन्हें पता है कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति जब अपनी पूरी बुद्धि और तकनीकी जानकारी किसी विनाशकारी कार्य में लगाएगा, तो उसका असर कई गुना बढ़ जाएगा। जिसकी धमक सात समुंदर पार तक सुनाई देती है।विदेशों में भी इनका नेटवर्क बेहद मजबूत है। कई बार इन संगठनों को आर्थिक, वैचारिक और तकनीकी सहायता विदेशों से मिलती रहती है। कुछ देशों की खुफिया एजेंसियां इन गतिविधियों पर नज़र रखती हैं, लेकिन इस तरह की साजिशें इतनी बारीकी से बुनी जाती हैं कि उन्हें पकड़ना कठिन होता है। खासकर जब किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आता है, तो समाज के लिए यह और भी चौंकाने वाला होता है, क्योंकि लोग सोचते हैं कि शिक्षा और उच्च पद व्यक्ति को विवेकशील बनाते हैं।बहरहाल, कट्टरपंथ विवेक से नहीं, अंधश्रद्धा और नफरत से पनपता है। यह उन लोगों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है जो खुद को तार्किक और आधुनिक समझते हैं। दरअसल, किसी भी रूप में जब विचारों की स्वतंत्रता खत्म हो जाती है और व्यक्ति अपनी सोच को सीमित कर लेता है, तब वह किसी भी भटका देने वाली विचारधारा का आसान शिकार बन जाता है। यही कारण है कि आज कट्टरपंथ की जड़ें हर शिक्षा प्रणाली में जांचने की जरूरत है,चाहे वह मदरसा हो, स्कूल हो या किसी विश्वविद्यालय का कैंपस।

यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि समाज के हर हिस्से में जागरूकता लाना आज बेहद जरूरी हो गया है। सरकारों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि आतंकवाद केवल सुरक्षा बलों के बल पर नहीं, बल्कि वैचारिक मजबूती और सामाजिक जागरूकता के बल पर खत्म किया जा सकता है। शिक्षित समाज को अपने भीतर झांकना होगा कि कहीं वह अपनी बुद्धि का उपयोग किसी गलत दिशा में तो नहीं कर रहा। नेताओं को भी यह समझना होगा कि वोट बैंक की राजनीति जितनी आसान दिखती है, उसके परिणाम उतने ही भयानक हो सकते हैं, क्योंकि जब वे किसी पक्ष को तुष्ट कर रहे होते हैं, तब वे अनजाने में एक विनाशकारी सोच को वैधता भी दे रहे होते हैं। कट्टरपंथ की जड़ों को पहचानने और काटने के लिए समाज के हर वर्ग को एकजुट होना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि विवेक और सहिष्णुता का निर्माण करना है। जब तक शिक्षित वर्ग अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक आतंक की यह विचारधारा नए चेहरों और नई रणनीतियों के साथ लौटती रहेगी। आज जरूरत है कि डॉक्टर से लेकर शिक्षक, इंजीनियर से लेकर नेता हर कोई अपने भीतर यह सवाल उठाए कि क्या वह सचमुच समाज के निर्माण में भूमिका निभा रहा है या अनजाने में विनाश के किसी सूत्र का हिस्सा बन चुका है।

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