नई दिल्ली में आयोजित सरदार पटेल स्मृति व्याख्यान के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का वक्तव्य देश की सुरक्षा नीति और आतंकवाद विरोधी रणनीति पर एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। डोभाल ने कहा कि भारत में आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा चुका है और यदि जम्मू-कश्मीर को छोड़ दिया जाए तो देश के अन्य भागों में अंतिम बड़ा आतंकी हमला वर्ष 2013 में हुआ था। उनका यह कथन केवल उपलब्धियों का उल्लेख भर नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घ रणनीतिक प्रक्रिया की पुष्टि भी करता है जिसमें भारत ने अपने सुरक्षा तंत्र को जमीनी स्तर तक सुदृढ़ किया है।1990 के दशक से लेकर 2010 के दशक तक भारत लगातार अलग-अलग प्रकार के आतंकवादी हमलों का सामना करता रहा। श्रीनगर से लेकर मुंबई और दिल्ली तक, अनेक संगठनों ने सीमा पार से संचालित हिंसक अभियानों के जरिए देश की आंतरिक स्थिरता को कमजोर करने का प्रयास किया। संसद हमला (2001), मुंबई हमले (2008), पठानकोट और उरी जैसे घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट किया कि आतंकवाद अब किसी सीमित क्षेत्र की समस्या नहीं रह गया था।
इन्हीं परिस्थितियों में भारत को आंतरिक सुरक्षा संगठन, खुफिया विभागों और सीमावर्ती निगरानी तंत्र को व्यापक रूप से सशक्त बनाना पड़ा। अजीत डोभाल जैसे अधिकारियों ने इस दिशा में एक दीर्घकालीन दृष्टि प्रस्तुत की, कि आतंकवाद को केवल सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि खुफिया समन्वय, आर्थिक प्रतिबंधों और पड़ोसी देशों पर कूटनीतिक दबाव के जरिए भी नियंत्रित किया जा सकता है। साल 2013 के बाद भारत में जिस प्रकार बड़े आतंकवादी हमलों का क्रम थमा, वह केवल भाग्य का परिणाम नहीं था। इसके पीछे सक्रिय प्रतिरोध और पूर्व-रोकथाम जैसी रणनीतियों का योगदान रहा। केंद्रीय और राज्य स्तर पर आतंक रोधी बलों का पुनर्गठन किया गया। संचार नेटवर्क, डिजिटल निगरानी और सीमा प्रबंधन में अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग आरंभ हुआ।
डोभाल का कहना कि 2013 के बाद कोई बड़ा आतंकी हमला देश के अन्य हिस्सों में नहीं हुआ, इस बात का संकेत देता है कि भारत की सुरक्षा नीति अब प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित ढांचे में काम कर रही है। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में छिटपुट घटनाओं के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर स्थायित्व बनाए रखना सुरक्षा एजेंसियों की सतत चौकसी का प्रमाण है। जम्मू-कश्मीर की स्थिति का उल्लेख डोभाल ने अलग से किया। यह संकेत देता है कि आतंकवाद का केंद्र अब सीमित भौगोलिक परिसीमन में सिमट चुका है। 2019 में अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद वहाँ प्रशासनिक और सुरक्षा ढांचे में बड़े बदलाव हुए, जिनका प्रभाव धीरे-धीरे सामने आ रहा है। हालाँकि पाकिस्तान प्रायोजित घुसपैठ के प्रयास और स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ से जुड़ी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। लेकिन तथ्य यह भी है कि घाटी में आतंकवाद का जनाधार पहले जैसी स्थिति में नहीं है। प्रशासनिक पारदर्शिता, विकास कार्य और युवाओं के लिए रोजगार सृजन जैसे उपाय अब सुरक्षा नीति के पूरक बन चुके हैं। यही कारण है कि डोभाल का वक्तव्य केवल स्थिति रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक नीतिगत घोषणा भी प्रतीत होता है कि भारत ने आतंकवाद को पूरी तरह हराया नहीं, पर उसकी जड़ों को काटने की दिशा में निर्णायक प्रगति कर ली है।
बहरहाल, आतंकवाद अब केवल घरेलू विषय नहीं रहा। भारत की विदेश नीति में भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जब से नई सुरक्षा दृष्टि अपनाई गई, भारत ने अनेक देशों के साथ आतंकवाद विरोधी सहयोग समझौते किए हैं। खाड़ी देशों, अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ के साथ खुफिया आदान-प्रदान की व्यवस्था सशक्त हुई है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह रहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह स्थापित किया कि आतंकवाद किसी विचारधारा या धर्म का नहीं, बल्कि मानवता का शत्रु है। इसकी परिणति यह हुई कि संयुक्त राष्ट्र मंचों पर भारत की पहल से कई आतंकी संगठनों और उनके मुखियाओं को वैश्विक प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया।
आतंकवाद पर नियंत्रण की सफलता केवल नीति निर्माण पर निर्भर नहीं होती; उसका क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है। केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय, खुफिया तंत्र की एकात्मता और स्थानीय पुलिस बलों का आधुनिकीकरण इस सफलता के प्रमुख आधार रहे। शहरी सुरक्षा नेटवर्क, रेलवे और हवाई अड्डों पर निगरानी तंत्र, साइबर सुरक्षा सेल, तथा सीमावर्ती गांवों में सामुदायिक चौकसी – इन सबने मिलकर एक सुरक्षात्मक परत तैयार की है, जिसके बीच से आतंकी गतिविधियों का प्रवेश अब पहले जैसा सरल नहीं रहा। इसके साथ ही नागरिक जागरूकता अभियानों ने भी भूमिका निभाई है। कई राज्यों में आम नागरिकों ने आशंका जनक गतिविधियों की सूचना देकर आतंकवाद की संभावनाओं को समय रहते विफल किया है।
डोभाल ने अपने व्याख्यान में जिस प्रसंग का चयन किया, वह भी महत्वपूर्ण है। सरदार पटेल का नाम भारत की एकता और अखंडता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। इसलिए उनकी स्मृति में दिए गए वक्तव्य के मंच से सुरक्षा नीति पर चर्चा करना केवल तात्कालिक बयान न होकर, वैचारिक संदेश भी है। पटेल ने जिस साहस और राजनीतिक दृढ़ता से रियासतों का एकीकरण किया, उसी दृष्टि को डोभाल ने वर्तमान परिस्थितियों में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के एकीकृत ढांचे’ के रूप में प्रस्तुत किया है। इस संदर्भ में उनका यह कहना कि “तथ्य स्पष्ट हैं और उनसे इनकार नहीं किया जा सकता”, एक आत्मविश्वासपूर्ण संदेश है कि भारत अब सुरक्षा के मोर्चे पर निर्भर राष्ट्र नहीं, बल्कि निर्णायक राष्ट्र के रूप में उभर चुका है।
कुल मिलाकर अजीत डोभाल का वक्तव्य केवल बीते वर्षों की उपलब्धियों का उल्लेख नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की सुरक्षा नीति की दिशा का भी संकेत है। यह न केवल आतंकवाद की भौतिक सीमाओं को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत ने आक्रामक और रक्षात्मक दोनों दृष्टियों को संतुलित करने की क्षमता विकसित कर ली है। यदि देश में पिछले बारह वर्षों से कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ, तो यह केवल सुरक्षा बलों की सफलता नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की दृढ़ निश्चय का परिणाम है, जिसमें नीति, प्रौद्योगिकी, कूटनीति, और जन-सहभागिता सभी शामिल हैं। भारत जिस आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंच पर आतंकवाद के विरुद्ध आवाज उठा रहा है, वह इस आंतरिक स्थिरता का ही प्रमाण है। डोभाल का यह कथन कि भारत ने आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया है, वास्तव में यह संकेत देता है कि राष्ट्र अब केवल रक्षा की स्थिति में नहीं, बल्कि शांति और स्थायित्व के मॉडल के रूप में खड़ा है।
