बिहार में क्या सत्ता की गारंटी है जातीय गोलबंदी

बिहार विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जातिवादी राजनीति का डंका बज रहा है। सभी दलों के नेता अपने-अपने हिसाब से तमाम जातियों को साधने में लगे हैं। वैसे भी बिहार की राजनीति में जाति का सवाल कोई नया नहीं है। आजादी के बाद से लेकर आज तक राज्य की राजनीतिक दिशा और दशा को जातीय समीकरणों ने ही सबसे अधिक प्रभावित किया है। भले ही विकास, शिक्षा, रोजगार और सुशासन की बातें हर चुनाव में कही जाती हों, लेकिन हकीकत यह है कि बिहार में कोई भी दल चुनावी गणित से पहले जातीय गणना का गुणा-भाग जरूर बैठाता है। यही कारण है कि राज्य में हर चुनाव जातीय गठबंधन, वोट बैंक और समुदाय-आधारित प्रचार के इर्द-गिर्द घूमता है। बिहार के राजनीतिक दल अपने एजेंडे और विचारधारा के बावजूद जाति को नजरअंदाज नहीं कर सकते। पिछले तीन दशकों में इसने एक स्थायी रूप ले लिया है। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने एमवाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादव गठजोड़ के जरिए सामाजिक न्याय और पिछड़ों की आवाज उठाकर सत्ता हासिल की थी। यह समीकरण इतना प्रभावशाली साबित हुआ कि इसके बल पर लालू यादव और फिर उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बिहार की राजनीति पर लंबे समय तक दबदबा बनाए रखा। दूसरी ओर, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने-अपने वर्गीय और जातीय आधार को मजबूत किया। भाजपा ने सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग को आकर्षित किया, जबकि जदयू ने कुर्मी और महादलित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की।

2020 के विधानसभा चुनावों में भी जाति का यह समीकरण खुलकर सामने आया था। चाहे वह सीटों का बंटवारा हो या प्रत्याशियों के चयन का मुद्दा, हर चरण पर जातीय संतुलन को ध्यान में रखकर ही रणनीति बनाई गई। एनडीए और महागठबंधन दोनों ने यह भली-भांति समझ लिया है कि बिहार में कोई भी पार्टी अकेले जातीय समीकरणों की अनदेखी कर सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। जनसंख्या आधारित शक्ति संतुलन चुनावी परिदृश्य को लगातार प्रभावित करता है। यादव, कुशवाहा, कुर्मी, राजपूत, ब्राह्मण, मुसलमान, पासवान और महादलित, प्रत्येक जाति की अपनी राजनीतिक अहमियत है और राजनीतिक दल उनके वोट को साधने के लिए सामाजिक सम्मेलन, पंचायत बैठकें, जातीय सम्मान समारोह जैसे आयोजन करते रहते हैं।

बिहार की राजनीति में जातिवाद का यह प्रभाव इतना गहरा है कि हर सामाजिक वर्ग के भीतर भी अब उपजातीय राजनीति पनप चुकी है। कुछ वर्षों से भूमिहार, यादव, कुशवाहा, मुसहर और पासवान समुदायों के भीतर भी नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल इन जातीय असंतोष और आकांक्षाओं को भुनाने में लगे हैं। उदाहरण के तौर पर, उपेंद्र कुशवाहा ने कुशवाहा समुदाय को संगठित कर जदयू और भाजपा दोनों से अलग राजनीतिक अस्तित्व की तलाश की। इसी तरह जीतन राम मांझी का हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा महादलित समुदाय की आवाज बनने की कोशिश करता रहा। चिराग पासवान अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को दलित सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव के आधार पर आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि राज्य में शिक्षा और जागरूकता के बढ़ते स्तर के कारण यह उम्मीद की जाती है कि जातिवाद का प्रभाव कम होगा, लेकिन अभी यह दूर की बात लगती है। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां जाति सिर्फ पहचान नहीं बल्कि सामाजिक ढांचे का केंद्र है, वहां जातिगत निष्ठाएं अब भी सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं। पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा तक, उम्मीदवार का नाम आते ही मतदाता पहले यह जानने की कोशिश करता है कि वह किस जाति से ताल्लुक रखता है। यही कारण है कि बड़े राजनीतिक दल भी जनकल्याण योजनाओं को जातीय अनुपात में बांटने की कोशिश करते हैं, ताकि कोई वर्ग नाराज न हो।

खैर, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि बिहार के सभी वोटर अब भी अंधे जातिवाद में फंसे हैं। शहरी इलाकों में खासकर युवाओं में एक नई सोच विकसित हो रही है। रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे धीरे-धीरे प्राथमिकता में आ रहे हैं। यह वर्ग जाति की जगह व्यक्तित्व, प्रदर्शन और योजनाओं पर ध्यान देने लगा है। लेकिन इस नए मतदाता वर्ग का प्रभाव अभी सीमित है और ग्रामीण वोटों के सामने इसकी संख्या कम है। इसलिए राजनीतिक दल जातीय समीकरण से समझौता नहीं करना चाहते। राज्य में हाल के वर्षों में जातिगत जनगणना को लेकर बहस भी इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए। एक ओर इसे सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व के तौर पर देखा गया, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक चाल बताकर इसकी आलोचना की। चुनावी रणनीति बनाने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इस जनगणना से उन जातियों का नया गणित तैयार हुआ है जिनकी उपेक्षा अब तक होती रही थी। इससे भविष्य में न सिर्फ नई राजनीतिक साझेदारियां बनेंगी बल्कि कुछ पारंपरिक गठबंधन टूट भी सकते हैं। जातिवादी राजनीति की यह जड़ें इतनी गहराई में हैं कि इसे किसी फैसले या नारे से मिटाना शायद असंभव है। यह बिहार के सामाजिक इतिहास, आर्थिक असमानता और सत्ता के केंद्रीकरण की लंबी प्रक्रिया से उपजा एक परिणाम है। जब तक अवसरों का संतुलित बंटवारा और शिक्षा का प्रसार हर वर्ग तक वास्तविक तौर पर नहीं पहुंचेगा, तब तक जाति की दीवारें राजनीतिक लाभ का साधन बनी रहेंगी। राजनीति में जाति का उपयोग पूरी तरह समाप्त नहीं तो कम से कम कमजोर तब होगा जब मतदाता यह समझने लगेगा कि उसका भविष्य जातीय पहचान से नहीं बल्कि नीतियों और विकास कार्यक्रमों से तय होता है।

फिलहाल, स्थिति यह है कि लगभग हर राजनीतिक दल जातिवाद के खिलाफ बयान देता है, मगर अपने घर में टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक उसी जातीय आधार पर काम करता है। यह दोहरा चरित्र बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी बिहार में कोई चुनाव जातिवाद के बिना संभव नहीं। केवल भाषणों और नारों में ही विकास की चर्चा होती है, जबकि जमीन पर अब भी जातीय अंकगणित ही तय करता है कि किसका पलड़ा भारी रहेगा। बिहार का आम वोटर अब इस खेल को समझ चुका है। वह जानता है कि नेता का जातिवादी राग उसके वोट की कीमत बढ़ाने की चाल है। फिर भी जब चुनाव आता है तो जातीय लामबंदी की अपीलों के आगे मतदाता भावनात्मक रूप से झुक जाता है। शायद यह सामाजिक संरचना की मजबूरी है या उस ऐतिहासिक परंपरा का असर, जिसने हर वर्ग को अपनी जातीय सीमा में कैद रख दिया। यही कारण है कि बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में जातिवाद अब भी जिंदा ही नहीं बल्कि फलता-फूलता नजर आता है, कभी सत्ता के गलियारों में, तो कभी चुनावी नारों के बीच, और कभी गांव की चौपालों पर चलती बहसों में।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *