देश में हाल के महीनों में बसों में आग लगने की घटनाएँ जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उसने हर आम नागरिक को झकझोर कर रख दिया है। शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, किसी न किसी राज्य से रोज़ ऐसी खबरें आती हैं जहाँ यात्रियों से भरी बस अचानक आग की लपटों में घिर जाती है। यह सिर्फ एक तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि हमारे सार्वजनिक परिवहन सिस्टम की गहराती कमजोरी की कहानी भी है। कुछ मिनटों में पूरी बस जलकर खाक हो जाती है और यात्री बाहर निकलने का मौका तक नहीं पाते। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों बार-बार ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जा रही हैं, जबकि हर हादसे के बाद जांच और सुधार के वादे किए जाते हैं।
भारत जैसे विशाल देश में बसें करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन की धुरी हैं। गाँवों से शहर, स्कूल से दफ्तर, तीर्थ से व्यापार हर यात्रा में बसें लोगों की सबसे सस्ती और सुलभ सवारी हैं। लेकिन जब यही सवारी असुरक्षा का पर्याय बन जाए, तो यह व्यवस्था के लिए चेतावनी की घंटी है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में कई भयानक हादसे हुए हैं। कहीं बस बिजली के तारों से टकराकर जल गई, कहीं ओवरहीटिंग के कारण इंजन से आग भड़की, तो कहीं खराब वायरिंग ने यात्रियों को लपटों में झोंक दिया। कई बार बसों में रखा डीज़ल टैंक या सिलेंडर फट जाता है, जिससे आग तेजी से फैल जाती है। दुखद यह है कि इन हादसों में अधिकांश बसें निजी थीं और उनमें सुरक्षा के मानक कागज़ों तक सीमित थे।
अगर गहराई से देखें तो बसों में आग लगने के मुख्य कारण चार हैं तकनीकी गड़बड़ी, रखरखाव की कमी, ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी। पहला कारण तकनीकी गड़बड़ी है, जो आज सबसे बड़ा जोखिम बन चुका है। कई निजी बस ऑपरेटर अपने वाहनों में एसी, अतिरिक्त लाइट, चार्जिंग पॉइंट और म्यूज़िक सिस्टम जैसी सुविधाएँ जोड़ते हैं। इससे बिजली का लोड बढ़ता है और पुरानी वायरिंग ओवरहीट होकर शॉर्ट सर्किट का कारण बनती है। अक्सर बस के इंजन या डैशबोर्ड के आसपास यह चिंगारी आग में बदल जाती है और कुछ ही मिनटों में पूरा वाहन जल उठता है। दूसरा बड़ा कारण है रखरखाव की अनदेखी। देश में कई बसें ऐसी हैं जो बिना सही तकनीकी जांच के सालों से सड़कों पर दौड़ रही हैं। फ्यूल टैंक, एग्जॉस्ट पाइप और इंजन कम्पार्टमेंट की समय पर सर्विसिंग नहीं होती। कई वाहनों में जोड़ों पर तेल और धूल जम जाती है, जो गर्मी में आसानी से आग पकड़ लेते हैं। यही लापरवाही जानलेवा साबित होती है।
तीसरा कारण ओवरलोडिंग और ज्वलनशील सामान का गलत इस्तेमाल है। कई बार बसों में यात्रियों के साथ-साथ पेट्रोल, गैस सिलेंडर, ड्रम या रासायनिक सामग्री तक ले जाई जाती है। इससे ज़रा सी चिंगारी भी विस्फोट का रूप ले लेती है। हाल की घटनाओं में देखा गया है कि कई बसों में यात्रियों की सीटों के नीचे ड्रम रखे गए थे या छत पर सिलेंडर बांधे गए थे, जो हादसे में आग के फैलाव का कारण बने। चौथा और सबसे गंभीर कारण सुरक्षा मानकों की पूरी तरह से अनदेखी है। बहुत सी बसों में फायर एक्सटिंग्विशर या तो होते ही नहीं या खराब रहते हैं। आपात निकास द्वार बंद होते हैं या यात्रियों को यह नहीं बताया जाता कि संकट के समय उनका उपयोग कैसे किया जाए। कुछ बसों में खिड़कियाँ भी ऐसी होती हैं जो बाहर से खुल नहीं पातीं, जिससे यात्रियों का बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है।
प्रशासन और परिवहन विभाग की भूमिका भी इस स्थिति में सवालों के घेरे में है। हर राज्य में बसों के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किए जाते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया अक्सर औपचारिकता मात्र बनकर रह जाती है। कई अधिकारी जांच किए बिना ही फिटनेस प्रमाणपत्र दे देते हैं। भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण ऐसे वाहन भी सड़कों पर उतर जाते हैं जो सुरक्षा मानकों पर बिल्कुल खरे नहीं उतरते। जब हादसे होते हैं तो जांच समितियाँ बनती हैं, रिपोर्टें आती हैं, पर कुछ हफ्तों बाद सब भुला दिया जाता है।
बस चालकों और कंडक्टरों की प्रशिक्षण की स्थिति भी बेहद कमजोर है। बहुत से ड्राइवरों को यह तक नहीं पता होता कि फायर एक्सटिंग्विशर का उपयोग कैसे किया जाता है या आग लगने पर यात्रियों को किस दिशा से निकालना चाहिए। इस कारण हादसे के वक्त अफरा-तफरी मच जाती है और कई बार लोग इसी भगदड़ में जान गंवा देते हैं। यात्रियों की ओर से भी सुरक्षा के प्रति लापरवाही देखने को मिलती है। अधिकतर लोग बस चुनते समय किराया और आराम को प्राथमिकता देते हैं, सुरक्षा को नहीं। शायद ही कोई यात्री यह देखता हो कि बस में आपात द्वार या फायर सेफ्टी उपकरण हैं या नहीं।
अगर समाधान की बात करें तो सबसे पहले बसों की तकनीकी जांच और फिटनेस प्रक्रिया को सख्ती से लागू करना होगा। हर राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिना प्रमाणित फिटनेस के कोई बस सड़क पर न उतरे। सभी बसों में ऑटोमेटिक फायर डिटेक्शन सिस्टम, स्मोक अलार्म और आधुनिक फायर एक्सटिंग्विशर लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। बस के इंजन कम्पार्टमेंट में ऐसे सेंसर लगाए जा सकते हैं जो तापमान बढ़ने पर तुरंत ड्राइवर को सतर्क करें। इसके अलावा ड्राइवरों और कंडक्टरों को नियमित रूप से सुरक्षा प्रशिक्षण देना जरूरी है ताकि आपात स्थिति में वे यात्रियों की जान बचा सकें।सरकार को चाहिए कि बसों के डिज़ाइन में भी सुधार करे। दरवाजे चौड़े बनाए जाएँ, खिड़कियाँ इस तरह से तैयार की जाएँ कि वे बाहर से भी खोली जा सकें। हर बस में इमरजेंसी हैमर हो जिससे जरूरत पड़ने पर शीशे तोड़े जा सकें। यात्रियों को भी जागरूक करने के लिए हर बस में सुरक्षा निर्देश लिखे जाने चाहिए। टिकट या सीट नंबर के साथ एक छोटा सुरक्षा कार्ड देना भी उपयोगी हो सकता है।
हादसों के बाद केवल मुआवजा देना काफी नहीं है। असली सुधार तभी आएगा जब जिम्मेदारी तय की जाएगी। जिस अधिकारी या मालिक की लापरवाही से दुर्घटना हुई, उस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे बार-बार होते रहेंगे इन आग की लपटों में सिर्फ बसें नहीं जलतीं, बल्कि वे सपने भी राख हो जाते हैं जो यात्री अपने साथ लेकर चलते हैं। किसी की माँ-बाप की आँखों के सामने उनका बेटा खो जाता है, किसी बच्चे की पढ़ाई वहीं खत्म हो जाती है, किसी घर का चिराग बुझ जाता है। हर हादसा सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि अनगिनत जिंदगियों की तबाही की कहानी है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार, बस मालिक और आम जनता मिलकर इस खतरे के खिलाफ ठोस कदम उठाएँ। हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। हर बस जो सड़क पर चल रही है, उसमें बैठा हर यात्री देश की जिम्मेदारी है। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक हर नई सुबह किसी बस की राख और किसी परिवार के आँसू लेकर आएगी। यह आग सिर्फ धातु और डीज़ल नहीं जलाती, यह व्यवस्था की नीयत और लापरवाही को भी बेनकाब करती है।अगर अब भी चेतना नहीं आई, तो यह लपटें किसी एक बस तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि पूरे सिस्टम को निगल जाएँगी। इसलिए जरूरी है कि हम आज ही तय करेंहर यात्रा से पहले सुरक्षा की जांच जरूरी है, क्योंकि जिंदगी का कोई ‘रीप्लेसमेंट पार्ट’ नहीं होता।
