सुबह तीन मंडल, शाम पार्टी से बाहर! मायावती का गुस्सा राईन और मुस्लिम वोट बैंक पर भारी

उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर अचानक करवट ले चुकी है। बहुजन समाज पार्टी, जो एक समय में प्रदेश की सत्ता पर मजबूत पकड़ रखती थी, आज अंदरूनी उथल-पुथल से गुजर रही है। पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने करीबी और बसपा के प्रमुख मुस्लिम चेहरे शमसुद्दीन राईन को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। यह कदम ऐसे वक्त में आया है जब पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी थी। राईन का निष्कासन न सिर्फ संगठनात्मक झटका है बल्कि यह मायावती की नेतृत्व शैली और बसपा की सियासी दिशा पर भी नए सवाल खड़े करता है।शमसुद्दीन राईन उन चुनिंदा नेताओं में से थे जिन पर मायावती को व्यक्तिगत भरोसा था। वे लंबे समय से बसपा में सक्रिय रहे और अलग-अलग मंडलों की ज़िम्मेदारी संभालते हुए पार्टी के मुस्लिम आधार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते रहे। कुछ ही दिन पहले मायावती ने उन्हें लखनऊ और कानपुर मंडल का प्रभारी बनाया था, लेकिन चंद घंटों के भीतर उनका सफर पार्टी में समाप्त हो गया। यह अचानक लिया गया फैसला न सिर्फ राईन के लिए बल्कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए भी हैरान करने वाला रहा।

बताया जाता है कि मायावती ने बुधवार सुबह शमसुद्दीन राईन को फोन किया था, लेकिन उन्होंने वह कॉल रिसीव नहीं किया। बसपा में मायावती के फोन का जवाब देना एक अनुशासनिक परंपरा मानी जाती है। यह कहा जा रहा है कि यही बात उनकी नाराजगी का कारण बनी। इसके बाद पार्टी प्रदेश अध्यक्ष की ओर से बयान जारी कर राईन को अनुशासनहीनता और गुटबाजी फैलाने के आरोप में निष्कासित कर दिया गया। हालांकि, राईन ने अपनी सफाई में कहा कि वह तबीयत खराब होने के कारण फोन नहीं उठा सके थे और वापस कॉल करने पर तक मायावती नाराज हो चुकी थीं।शमसुद्दीन राईन का बसपा में कद छोटा नहीं था। वे पसमांदा मुस्लिम समुदाय से आते हैं, जो राज्य के मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा है। जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मसूद अली जैसे पुराने मुस्लिम नेता बसपा से अलग हुए, तब मायावती ने राईन को आगे बढ़ाया और उन्हें नए मुस्लिम चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया। वे लगातार पार्टी के लिए सक्रिय रहे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने का काम करते रहे। 2019 के चुनाव में जिन मंडलों की ज़िम्मेदारी उनके पास थी, वहां बसपा का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा था।

मायावती की राजनीतिक शैली हमेशा से सख्त मानी जाती है। वे पार्टी में किसी भी तरह की गुटबाजी या असहमति को बर्दाश्त नहीं करतीं। कई बार उनके करीबी नेता भी इसी सख्ती का शिकार हुए हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य और बाबू सिंह कुशवाहा जैसे कई नेता बसपा से बाहर किए जा चुके हैं। मायावती का मानना है कि अनुशासन ही पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही अनुशासन कई बार संगठन को कमजोर करने लगे, तो क्या इसे रणनीतिक मजबूती कहा जा सकता है?बसपा का जनाधार बीते कुछ सालों में लगातार घटा है। 2007 में मायावती ने बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रचा था, लेकिन 2012, 2017 और 2022 में पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा केवल एक सीट पर सिमट गई। दलितों के पारंपरिक वोट बैंक में अब भी उनका असर है, लेकिन गैर-जाटव दलित और मुस्लिम समुदाय उनसे दूर होते जा रहे हैं। विपक्ष लगातार बसपा पर बीजेपी की ‘बी-टीम’ होने के आरोप लगाता रहा है, जिससे मुस्लिम मतदाता और भी दूर हुए हैं। ऐसे में राईन जैसे नेता पार्टी के लिए उस दूरी को पाटने का जरिया थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राईन का जाना बसपा के मुस्लिम समीकरण को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। वे पसमांदा समाज के ऐसे नेता थे जो जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय रखते थे। उनके पास बूथ स्तर तक का नेटवर्क था और स्थानीय स्तर पर कई मुस्लिम कार्यकर्ता उन्हीं के संपर्क में थे। अब उनके बाहर होने से यह नेटवर्क निष्क्रिय हो सकता है। इससे बसपा की जमीनी पकड़ और कमजोर होगी, खासकर पश्चिमी यूपी में जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है।पार्टी के अंदर भी इस फैसले को लेकर असमंजस है। कुछ नेता इसे मायावती की सख्त अनुशासन नीति का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय मान रहे हैं। बसपा की रणनीति हमेशा से मायावती-केंद्रित रही है। वे हर निर्णय खुद लेती हैं और किसी नेता को स्वतंत्रता की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। यह केंद्रीकृत नेतृत्व एक समय बसपा की ताकत था, लेकिन अब वही उसकी कमजोरी बनता जा रहा है। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे आने का मौका नहीं मिल रहा, जिससे संगठन में ठहराव बढ़ा है।

शमसुद्दीन राईन ने अपनी प्रतिक्रिया में मायावती को अपना राजनीतिक गुरु बताते हुए कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि यह फैसला स्थायी नहीं होगा। वे जल्द ही मायावती से मुलाकात कर अपनी बात रखना चाहते हैं। उनके समर्थक भी यही मानते हैं कि बसपा प्रमुख के गुस्से के शांत होने के बाद राईन की वापसी संभव है। लेकिन मायावती के पिछले फैसले बताते हैं कि एक बार लिया गया निर्णय शायद ही पलटा गया हो। वे अपनी राजनीतिक शैली में अनुशासन को सर्वोपरि रखती हैं और उसमें किसी के लिए अपवाद नहीं बनातीं।बसपा के लिए यह समय चुनौती भरा है। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और पार्टी को अपनी खोई जमीन वापस हासिल करनी है। मायावती अब पहले की तरह करिश्माई नेता नहीं रहीं, जो हर समुदाय को जोड़ सकें। बदलते राजनीतिक समीकरणों में पार्टी को दलितों के साथ-साथ मुस्लिमों का समर्थन भी चाहिए, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह आसान नहीं दिखता। शमसुद्दीन राईन जैसे नेताओं का जाना इस दिशा में पार्टी के लिए झटका साबित हो सकता है।

मायावती का यह कदम उनकी नेतृत्व शैली का प्रतीक है, लेकिन साथ ही यह बताता है कि बसपा अभी भी पुराने ढांचे में बंधी हुई है। आज की राजनीति में संवाद, भागीदारी और जनसंपर्क की अहमियत बढ़ चुकी है। ऐसे में एकतरफा फैसले पार्टी को और हाशिए पर धकेल सकते हैं। मायावती के लिए यह समय आत्ममंथन का है क्या पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए सख्ती काफी है या अब लचीलेपन की भी जरूरत है?शमसुद्दीन राईन की विदाई बसपा के अनुशासन की मिसाल जरूर है, लेकिन यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या मायावती ने इस बार एक वफादार सिपाही खो दिया है। पार्टी पहले से कमजोर स्थिति में है, और यह फैसला आने वाले चुनावी मौसम में उसे और नुकसान पहुंचा सकता है। उत्तर प्रदेश की सियासत में भरोसा और संवाद अब पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गया है। बसपा को अगर अपनी साख बचानी है, तो उसे सिर्फ आदेशों से नहीं, बल्कि संवाद से भी अपने कार्यकर्ताओं और वोटरों को जोड़ना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *