अमेरिका की चापलूसी में डूबे शाहबाज शरीफ, पाकिस्तान में बने मजाक का पात्र

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ एक बार फिर अपने बयानों के चलते अपने ही देश में कटघरे में खड़े हो गए हैं। मिस्र में गाजा शांति सम्मेलन के दौरान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुलकर तारीफ करना और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की वकालत करना अब शाहबाज शरीफ को भारी पड़ रहा है। पाकिस्तानी अवाम और सोशल मीडिया यूजर्स उन्हें ट्रंप का ‘चाटुकार’ और ‘चापलूस’ बताकर जमकर ट्रोल कर रहे हैं।लोगों का कहना है कि अगर चापलूसी के लिए कोई नोबेल पुरस्कार होता, तो शाहबाज शरीफ सबसे पहले उसके दावेदार होते। किसी ने लिखा कि “प्रधानमंत्री नहीं, व्हाइट हाउस के स्पोक्सपर्सन लगते हैं”, तो किसी ने सवाल दागा कि जब देश में X (पहले ट्विटर) बंद है, तो शाहबाज उसी पर क्यों ट्रंप की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं?दरअसल, गाजा सम्मेलन में जब ट्रंप ने भाषण समाप्त किया तो उन्होंने अचानक मंच से शाहबाज शरीफ को बुला लिया और पूछा, “क्या आप कुछ कहना चाहेंगे?” इस पर शाहबाज शरीफ ने पांच मिनट तक ट्रंप की तारीफ करते हुए उन्हें ‘शांति दूत’ बताया और यह तक कहा कि दुनिया को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है।

शाहबाज के इस बयान ने न सिर्फ पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई, बल्कि आम जनता ने भी इसे देश की बेइज्जती के रूप में देखा। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान अब इतना गिर चुका है कि खुद को अमेरिका के सामने झुकाकर ही राहत की उम्मीद करता है?असल में पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है। महंगाई चरम पर है, विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा है, और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) की शर्तों के आगे घुटने टेकने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। ऐसे में पाकिस्तान को लगता है कि अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश है, जो उसे इस दलदल से निकाल सकता है।शाहबाज शरीफ की सरकार बार-बार संकेत दे चुकी है कि अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते ही पाकिस्तान के लिए संकटमोचक बन सकते हैं। इसी सोच के तहत बलूचिस्तान में पसनी बंदरगाह को अमेरिका को सौंपने का प्रस्ताव भी दिया गया है। यह बंदरगाह ग्वादर से सिर्फ 110 किलोमीटर दूर है, जिसे चीन चला रहा है। यानी, एक तरफ पाकिस्तान चीन से अरबों डॉलर निवेश ले रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका को भी साधने की कोशिश कर रहा है।पसनी बंदरगाह अमेरिका को इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह बलूचिस्तान में मौजूद बेशकीमती खनिजों तक आसानी से पहुंच सके। खबरें हैं कि अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स ने पाकिस्तानी सेना की कंपनी फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन के साथ 500 मिलियन डॉलर की डील की है। लक्ष्य है  जमीन से सोना निकालना और उसे तट तक लाना।

जो बाइडन के कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में काफी खटास आ गई थी। आतंकवाद को लेकर अमेरिकी सख्ती और पाकिस्तान की ढुलमुल नीति ने दोनों देशों को एक-दूसरे से दूर कर दिया। उस समय इमरान खान की सरकार थी, और उन्होंने तो खुलेआम अमेरिका पर अपनी सरकार गिराने का आरोप भी लगाया था।अब जब डोनाल्ड ट्रंप फिर से सुर्खियों में हैं और 2024 के अमेरिकी चुनावों में जीत दर्ज कर चुके हैं, तो पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा है। शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर दोनों व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात कर चुके हैं।यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब भारत ने मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन ‘सिंदूर’ को अंजाम दिया था। इसके बाद ट्रंप ने 10 मई को युद्धविराम कराने का दावा किया था। पाकिस्तान अब ट्रंप को ही शांति का मसीहा बताकर उन्हें अपने पक्ष में पूरी तरह करने की कोशिश में जुटा है।पाकिस्तान को उम्मीद है कि अमेरिका न सिर्फ आर्थिक मदद देगा, बल्कि भविष्य में भारत या ईरान के साथ टकराव की स्थिति में उसे हथियार और कूटनीतिक समर्थन भी मिलेगा। हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को AIM-120 AMRAAM मिसाइल देने की योजना बनाई है। यह मिसाइल एफ-16 फाइटर जेट्स पर लगती है और 100 किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान को गिरा सकती है।यही मिसाइल 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारत के मिग-21 को गिराने में इस्तेमाल हुई थी, जिसमें विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान ने पकड़ लिया था। पाकिस्तान अब इन मिसाइलों को भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, ताकि कश्मीर मुद्दे को फिर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जा सके।ट्रंप खुद भी कश्मीर पर मध्यस्थता की बात पहले कर चुके हैं, इसलिए पाकिस्तान को लगता है कि इस मुद्दे पर भी ट्रंप से लाभ मिल सकता है।

पाकिस्तान की मौजूदा सरकार सेना के इशारों पर चल रही है, और यह बात खुद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी कह चुके हैं। इस ‘हाइब्रिड सरकार’ की विदेश नीति का मकसद है — सभी को खुश रखना। एक तरफ चीन से 8.5 अरब डॉलर का निवेश लिया जा रहा है, दूसरी तरफ अमेरिका को पसनी बंदरगाह सौंपकर साधने की कोशिश हो रही है।पाकिस्तान को डर है कि चीन से नजदीकी अमेरिका को नाराज कर सकती है, इसलिए वह दोनों देशों को साथ लेकर चलना चाहता है। लेकिन यह रणनीति कब तक सफल रहेगी, यह कहना मुश्किल है।पाकिस्तानी जनता अब इस चापलूसी भरे रवैये से तंग आ चुकी है। ट्विटर (अब X) पर शाहबाज शरीफ को लेकर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वह बताती हैं कि आम लोगों को यह सब पसंद नहीं आ रहा। खासकर तब, जब पाकिस्तान में X बैन है और खुद प्रधानमंत्री उसी प्लेटफॉर्म से ट्रंप की तारीफ कर रहे हैं।लोग पूछ रहे हैं कि क्या देश का प्रधानमंत्री इतना असहाय है कि अमेरिका की तारीफ किए बिना एक भी भाषण पूरा नहीं कर सकता? क्या पाकिस्तान की विदेश नीति अब सिर्फ चापलूसी पर टिकी है?

शाहबाज शरीफ का ट्रंप की तारीफ में किया गया भाषण फिलहाल उन्हें घरेलू मोर्चे पर भारी पड़ रहा है। यह बात समझनी होगी कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सम्मान और स्वाभिमान भी उतना ही जरूरी होता है जितना कि रणनीतिक समझदारी। सिर्फ बड़े देशों की चापलूसी कर लेने से मदद नहीं मिलती, बल्कि खुद को एक मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में पेश करना होता है।शायद शाहबाज शरीफ को यह बात अब समझनी चाहिए, वरना आने वाले दिनों में पाकिस्तान की जनता का गुस्सा और भी भड़क सकता है  और तब यह चापलूसी उनके लिए राजनीतिक संकट का कारण बन सकती है।

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