यूपी में 61 पार्टियों पर फर्जीखर्चा का शिकंजा, चुनाव आयोग करेगा कड़ी कार्रवाई!

लखनऊ: पिछले 6 साल में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में खर्च का हिसाब न देने पर नोटिस पाने वाले 48 प्रतिशत दल आयोग में अपना पक्ष ही नहीं रखने पहुंचे। इसके आधार पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इन दलों पर कार्रवाई की तैयारी कर ली है। इनका पंजीकरण रद करने के लिए चुनाव आयोग को लिखा जाएगा। गुरुवार को सुनवाई की मियाद खत्म हो गई। हर राजनीतिक दल को प्रतिवर्ष 30 सितंबर तक अपनी अंशदान रिपोर्ट और 31 अक्टूबर तक अपने आय-व्यय की ऑडिट रिपोर्ट देना जरूरी है।

लोकसभा चुनाव के बाद 90 दिनों में व विधानसभा चुनाव के बाद 75 दिनों में चुनाव खर्च का ब्योरा देना होता है। साथ ही 20 हजार रुपये से ज्यादा चंदे का भी पूरा हिसाब देना होता है। खर्च का हिसाब न देने वाले 127 दलों को मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से नोटिस जारी कर 3 अक्टूबर तक अंशदान रिपोर्ट, वार्षिक लेखा परीक्षण (ऑडिट) रिपोर्ट एवं निर्वाचन व्यय विवरणी जमा करने को कहा गया था। इसके बाद सोमवार से बुधवार तक अलग-अलग दलों को सुनवाई का मौका दिया गया।

इसमें 66 दल ही अपना पक्ष रखने पहुंचे और 61 दल सुनवाई से गायब रहे। सुनवाई में आए दलों की अंशदान रिपोर्ट, वार्षिक लेखा परीक्षण (ऑडिट) रिपोर्ट एवं निर्वाचन व्यय विवरणी जैसे अहम दस्तावेज का परीक्षण किया गया। पार्टियों के मोबाइल नंबर, ई-मेल व पते की वैधता भी जांची गई। अब आयोग सुनवाई में शामिल न होने वाले और सुनवाई के दौरान पूरे दस्तावेज पेश न करने वाले दलों पर कार्रवाई के लिए चुनाव आयोग को अपनी रिपोर्ट भेजेगा। इसके आधार पर उनका पंजीकरण खत्म किया जा सकता है।

क्यों सख्त हैं आयोग के तेवर
चुनाव आयोग लगातार कागजी दलों पर कार्रवाई कर रहा है। हाल में ही पिछले 6 साल में लोकसभा या विधानसभा का कोई भी चुनाव न लड़ने वाले दलों को भी आयोग ने नोटिस जारी किया था। सही दस्तावेज पेश न करने पर यूपी में पंजीकृत 115 दलों का पंजीकरण अगस्त और 121 दलों का पंजीकरण सितंबर में रद कर दिया गया था।आयोग के एक अधिकारी का कहना है कि कागजों पर पनपने वाले ये सियासी दल बहुत बार डमी के रूप में चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करते है। नोटबंदी के बाद काला धन खपाने का भी माध्यम भी इन पार्टियों को बनाया गया था। इसके आधार पर विभिन्न नियामक एजेंसियों ने कार्रवाई भी की थी। इसलिए आयोग ने खुद ही ऑपरेशन क्लीन शुरू किया है, जिससे चुनाव प्रक्रिया को शुचितापूर्ण बनाया जा सके। खर्च का हिसाब न देने वाले दलों पर कार्रवाई भी इसी अभियान का हिस्सा है।

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