योगी सरकार का बड़ा फैसला: जातीय रैलियों पर रोक, एफआईआर से जाति हटेगी, अखिलेश ने सवाल उठाए

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जातिगत भेदभाव मिटाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सोमवार को जारी आदेश में जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। अब पुलिस की एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो, चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों में जाति का जिक्र नहीं होगा। शिकायतकर्ता या आरोपी की पहचान माता-पिता के नाम से होगी। सरकारी वाहनों, पुलिस थानों और सार्वजनिक स्थानों से जातिगत प्रतीक, नारे या स्लोगन हटाने के आदेश हैं। सोशल मीडिया पर भी जाति प्रदर्शन की निगरानी होगी। हालांकि, एससी-एसटी एक्ट के मामलों में जाति का उल्लेख जरूरी रहेगा। यह कदम समाज में समानता की दिशा में क्रांतिकारी माना जा रहा है।

यह आदेश हाईकोर्ट के 16 सितंबर 2025 के फैसले से प्रेरित है, जिसमें न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर ने कहा कि जाति का जिक्र ‘संवैधानिक नैतिकता’ के खिलाफ है और यह ‘राष्ट्रविरोधी’ भावना को बढ़ाता है। कोर्ट ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि जाति समाज को तोड़ती है, नफरत और ईर्ष्या पैदा करती है। सरकार को निर्देश दिया गया कि जाति के महिमामंडन पर रोक लगे, साइनबोर्ड और वाहनों से जातिगत चिन्ह हटें, स्कूलों में समानता पर पाठ्यक्रम जोड़ा जाए और पब्लिक सर्वेंट्स के लिए संवेदनशीलता ट्रेनिंग अनिवार्य हो। कोर्ट ने यूपी डीजीपी की आलोचना की, उन्हें ‘हाथी के दांत’ जैसा बताया। यह फैसला एक आपराधिक मामले से निकला, जहां एफआईआर में आरोपी की जाति लिखी गई थी, जिसे कोर्ट ने ‘पहचान प्रोफाइलिंग’ करार दिया।

मुख्य सचिव दीपक कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश का समाज कल्याण राज्यमंत्री असीम अरुण ने स्वागत किया। उन्होंने कहा, ‘यह फैसला समाज को नई दिशा देगा। विकास का मतलब सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक भेदभाव खत्म करना भी है।’ भाजपा नेता इसे 2027 के चुनाव से पहले जातिवादी राजनीति पर लगाम लगाने वाला कदम बता रहे हैं। लेकिन विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर पांच सवाल उठाए, जो सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। उन्होंने लिखा, ‘5000 साल पुरानी जातिगत भेदभाव की भावना को मन से कैसे मिटाएंगे?’ उनके सवाल हैं- पहला, मन में बसी जातिगत मानसिकता को दूर करने का क्या उपाय? दूसरा, वस्त्र और प्रतीकों से होने वाले जाति प्रदर्शन पर क्या कदम? तीसरा, नाम से पहले जाति पूछने की आदत को कैसे रोका जाएगा? चौथा, झूठे आरोपों से वर्गों को बदनाम करने की प्रवृत्ति पर क्या इंतजाम? पांचवां, सरकारी नौकरियों में जातिगत पक्षपात कैसे रुकेगा, खासकर जब पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को नजरअंदाज किया जा रहा हो?

अखिलेश के सवाल सपा के पीडीए वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हैं। वे लंबे समय से आरोप लगाते हैं कि भाजपा ठाकुरों को तरजीह देती है। अब सवाल है कि क्या यह आदेश जमीन पर लागू होगा? बसपा की 9 अक्टूबर की रैली इसकी पहली परीक्षा हो सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम संविधान की भावना को मजबूत करेगा, लेकिन जागरूकता और शिक्षा से ही असली बदलाव आएगा। योगी सरकार का दावा है कि यह फैसला ‘सबका साथ, सबका विकास’ को नई ताकत देगा। देखना होगा कि यह समाज को जोड़ेगा या राजनीतिक हथियार बनेगा।

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