वो ‘सेक्युलर’ हिंदू, जो पाकिस्तान की मांग का था कट्टर समर्थक; जब विभाजन हुआ तो जिहादियों ने लाहौर में पहले उसे ही मारा

भारत और पाकिस्तान का विभाजन इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसकी सिहरन आज भी दिलों को दहला देती है। यह वह दौर था जब धर्म के नाम पर नफरत की दीवारें खड़ी हुईं, लाखों जिंदगियां उजड़ीं और इंसानियत का गला घोंट दिया गया। इस खूनी दौर में एक ऐसी शख्सियत भी थी, जिसने मोहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान के सपने को अपना मान लिया। यह थे लाहौर के मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण, जिन्हें अपने सेकुलर विचारों पर गर्व था। वह जिन्ना के वादों पर यकीन करते थे कि पाकिस्तान में हर धर्म के लोग बराबरी के साथ रह सकेंगे। लेकिन वही सपना उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा बन गया। 14 अगस्त 1947 की रात लाहौर की सड़कों पर उनकी निर्मम हत्या ने न सिर्फ एक विद्वान की जिंदगी छीनी, बल्कि उन तमाम सेकुलर विचारों को भी रौंद दिया, जो एक समावेशी पाकिस्तान की उम्मीद रखते थे।

प्रोफेसर बृज नारायण: सेकुलरिज्म का प्रतीक

1888 में जन्मे बृज नारायण लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। उनकी किताबें जैसे ‘इंडियन इकोनॉमिक लाइफ’ (1929), ‘पॉपुलेशन ऑफ इंडिया’ (1925) और ‘एसेज ऑन इंडियन इकोनॉमिक प्रॉब्लम्स’ (1919) ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। वह न केवल एक विद्वान थे, बल्कि एक प्रगतिशील विचारक भी, जो भारत की आर्थिक समस्याओं को गहराई से समझते थे। लेकिन 1940 के दशक में जब मुस्लिम लीग ने टू-नेशन थ्योरी के आधार पर अलग पाकिस्तान की मांग को तेज किया, तो बृज नारायण ने इसे न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि इसका खुलकर समर्थन भी किया।

उनका मानना था कि मुसलमानों को अपनी पहचान और हक के लिए एक अलग मुल्क मिलना चाहिए। उन्होंने कई लेख और किताबें लिखीं, जिनमें उन्होंने आर्थिक दृष्टिकोण से पाकिस्तान के गठन को सही ठहराया। जहां ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते थे कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से टिक नहीं पाएगा, वहीं बृज नारायण ने तर्क दिया कि पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल की कृषि और संसाधन मिलकर एक मजबूत आर्थिक आधार बनाएंगे। उनके लेख अखबारों में छपते, जिसमें वह दावा करते कि पाकिस्तान न केवल आत्मनिर्भर होगा, बल्कि भारत से बेहतर आर्थिक मॉडल स्थापित करेगा।

बृज नारायण का यह रुख सिर्फ आर्थिक विश्लेषण तक सीमित नहीं था। वह गहरे सेकुलर विचारों के धनी थे। उन्हें यकीन था कि जिन्ना का पाकिस्तान एक ऐसा लोकतांत्रिक देश होगा, जहां हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य गैर-मुस्लिमों को बराबरी का हक मिलेगा। 11 अगस्त 1947 को कराची में जिन्ना के उस ऐतिहासिक भाषण ने उनके विश्वास को और मजबूत किया, जिसमें जिन्ना ने कहा था, “पाकिस्तान में सभी नागरिक, चाहे उनका धर्म, जाति या नस्ल कुछ भी हो, बराबर होंगे।” इस भाषण को बृज नारायण ने अपने लेखों में बार-बार उद्धृत किया और लोगों से अपील की कि वह इस नए मुल्क के निर्माण में योगदान दें।

डायरेक्ट एक्शन डे और नजरअंदाज की गई सच्चाई

1946 में जब मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का आह्वान किया, तो बंगाल, बिहार और पंजाब में सांप्रदायिक हिंसा का तांडव शुरू हो गया। खासकर कोलकाता में हिंदुओं और सिखों पर सुनियोजित हमले हुए। इतिहासकार यास्मिन खान अपनी किताब ‘द ग्रेट पार्टिशन’ में लिखती हैं कि इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए। लेकिन बृज नारायण ने इन हमलों को ‘बड़े आंदोलन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ कहकर टाल दिया। वह मानते थे कि जब कोई बड़ा बदलाव आता है, तो ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। उनके इस रुख से जिन्ना इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बृज नारायण को लाहौर में ही रहने का आग्रह किया। जिन्ना ने कहा कि वह पाकिस्तान के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

लाहौर का बदलता चेहरा

1947 की गर्मियों तक लाहौर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। मई 1947 से हिंदू और सिखों का पलायन शुरू हो गया। लोग दिल्ली, अमृतसर और जालंधर की ओर भाग रहे थे। इतिहासकार सोम आनंद अपनी किताब ‘लाहौर: ए सेंटिमेंटल जर्नी’ में लिखते हैं कि अगस्त 1947 तक लाहौर में सिर्फ 10 हजार हिंदू और सिख बचे थे। ये लोग उम्मीद लगाए थे कि स्थिति सामान्य हो जाएगी और वे अपनी पैतृक भूमि पर रह सकेंगे। लेकिन रेडक्लिफ लाइन की घोषणा ने उनकी सारी उम्मीदें तोड़ दीं। 14 अगस्त 1947 को जब पाकिस्तान का जन्म हुआ, तो लाहौर में हिंसा का तूफान उठ खड़ा हुआ।शहर में आपराधिक गिरोह सक्रिय हो गए। हिंदू और सिखों के घरों को चुन-चुनकर लूटा गया, आग के हवाले किया गया। सड़कों पर लाशें बिछ गईं। पत्रकार गोपाल मित्तल अपनी किताब ‘लाहौर का जो जिक्र किया: आप बिते’ में लिखते हैं कि लाहौर का वह चेहरा, जो कभी हिंदू, सिख और मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक था, कुछ ही दिनों में खून से लथपथ हो गया। इस हिंसा में कोई भेदभाव नहीं था महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, सब इसके शिकार बने।

बृज नारायण का अंतिम दिन

इस खौफनाक माहौल में भी बृज नारायण अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। निकलसन रोड पर उनका घर उनकी मातृभूमि था, जिसे छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था। वह मानते थे कि जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान उनके जैसे लोगों का सम्मान करेगा। स्वीडिश-पाकिस्तानी शोधकर्ता इश्तियाक अहमद अपनी किताब ‘द पंजाब: ब्लडीड, पार्टिशन्ड एंड क्लेंज्ड’ (पेज 409-411) में विस्तार से बताते हैं कि 14 अगस्त की रात जब एक उन्मादी भीड़ उनके इलाके में पहुंची, तो बृज नारायण बेखौफ होकर सामने आए।

भीड़ खाली पड़े हिंदू-सिख घरों को लूट रही थी और आग लगा रही थी। ‘अल्लाह ओ अकबर’ के नारे गूंज रहे थे। बृज नारायण ने जोर से चिल्लाया, “यह संपत्ति अब पाकिस्तान की है, इसे नष्ट न करें। मैं जिन्ना का समर्थक हूं, मैंने इस मुल्क के लिए काम किया है।” उनकी बातों का असर हुआ और पहली भीड़ वहां से चली गई। लेकिन यह शांति ज्यादा देर नहीं टिकी। कुछ ही मिनटों बाद एक और हिंसक समूह वहां पहुंचा। बृज नारायण ने फिर से समझाने की कोशिश की। उन्होंने अपने लेख और जिन्ना के साथ पत्राचार दिखाने की पेशकश की। लेकिन इस बार उनकी आवाज दब गई। भीड़ में से किसी ने चिल्लाया, “यह काफिर है, इसे मार डालो!”

उसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत के लिए एक बदनुमा दाग बन गया। सैकड़ों की उन्मादी भीड़ ने तलवारों, चाकुओं और लाठियों से बृज नारायण पर हमला कर दिया। उनके घर में घुसकर उन्हें उनके ही ऑफिस में काट डाला गया। हत्या के बाद उनके घर को लूटा गया, उनकी बेशकीमती लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया गया। वह लाइब्रेरी, जिसमें उनके जीवन की मेहनत और विद्वता समाई थी, राख में बदल गई।

एक विश्वासघात की कहानी

बृज नारायण की हत्या ने लाहौर के बचे-खुचे हिंदू और सिखों में दहशत फैला दी। कई लोग तुरंत भारत की ओर भागे। उनकी मौत ने यह साबित कर दिया कि जिन्ना के वादे खोखले थे। वह मुल्क, जिसके लिए बृज नारायण ने इतनी वकालत की, उसी ने उन्हें ‘काफिर’ कहकर सजा दी। पंजाब विश्वविद्यालय आज भी उन्हें एक शहीद के रूप में याद करता है, जिसने अपने सिद्धांतों और विश्वास के लिए अपनी जान दी।यह कहानी सिर्फ बृज नारायण की नहीं, बल्कि उस दौर की है, जब धर्म के नाम पर बंटवारा हुआ और लाखों सपने चकनाचूर हो गए। 78 साल बाद भी यह घटना हमें चेतावनी देती है कि नफरत और कट्टरता के आगे कोई विचारधारा नहीं टिक सकती। बृज नारायण का बलिदान हमें यह सिखाता है कि सच्चाई को परखे बिना किसी सपने पर यकीन करना कितना खतरनाक हो सकता है।

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