भारत और पाकिस्तान के बीच गेंद-बल्ले के खेल के मुकाबलों का इतिहास हमेशा से ही दोनों देशों के आपसी संबंधों से जुड़ा रहा है। हाल ही में, एशिया कप के सिलसिले में होने वाले भारत-पाकिस्तान मुकाबले को लेकर एक जनहित याचिका सर्वाेच्च न्यायालय में दायर की गई थी, जिसमें इस मुकाबले पर रोक लगाने की मांग की गई थी। यह याचिका इसलिए आई क्योंकि दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव बढ़ा हुआ है और कुछ लोग मानते हैं कि ऐसे समय में खेल के मैदान पर मिलना उचित नहीं। लेकिन आज गुरूवार को सर्वाेच्च न्यायालय ने इस याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुकाबला होना चाहिए और इसमें कोई हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि खेल को राजनीतिक विवादों से अलग रखने की परंपरा बनी रहनी चाहिए। मुकाबला 14 सितंबर को दुबई में होना तय है, जहां दोनों टीमें टी-ट्वेंटी प्रारूप में आमने-सामने होंगी। न्यायालय के इस रुख से खेल प्रेमियों में उत्साह है, लेकिन कुछ लोग इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच अनुचित मान रहे हैं।
इससे पहले भी कई बार दोनों देशों के बीच तनाव ने इन मुकाबलों को प्रभावित किया है। 1962 से 1877 तक कोई मुकाबला नहीं हुआ क्योंकि 1965 और 1971 में युद्ध छिड़ गए थे। इन युद्धों ने न केवल सीमाओं को प्रभावित किया बल्कि खेल के मैदानों को भी सूना कर दिया। उसके बाद धीरे-धीरे संबंध सुधरे और उन्नीस सौ अस्सी के दशक में मुकाबले फिर शुरू हुए, लेकिन कश्मीर मुद्दे ने कई बार बाधा डाली। उदाहरण के लिए, 1990-91 में जब भारत ने एशिया कप की मेजबानी की, तब कश्मीर में विद्रोह के कारण पाकिस्तान ने भाग लेने से मना कर दिया। फिर 1979 में कारगिल संघर्ष ने मुकाबलों को प्रभावित किया, जिसके बाद द्विपक्षीय शृंखलाएं रुक गईं। सबसे बड़ा झटका 2008 में मुंबई हमलों के बाद लगा, जब भारत ने पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया और आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया। 2009 में भी तीन परीक्षण मुकाबलों और पांच एक दिवसीय मुकाबलों की शृंखला रद्द हो गई। इन घटनाओं ने दिखाया कि राजनीतिक तनाव सीधे खेल संबंधों पर असर डालता है, लेकिन बहुपक्षीय प्रतियोगिताओं जैसे विश्व कप या एशिया कप में ज्यादातर मुकाबले जारी रहे क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधीन होते हैं।
फिर भी, कई मौकों पर खेल ने दोनों देशों के बीच पुल का काम किया है। 1987 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति का भारत दौरा खेल के बहाने हुआ, जिसे खेल कूटनीति कहा गया। लेकिन कश्मीर और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने बार-बार बाधा डाली। 1979 के दशक के अंत में कश्मीर संकट के कारण मुकाबले प्रभावित हुए। कुल मिलाकर, इन मुकाबलों का इतिहास दर्शाता है कि तनाव के समय खेल या तो रुक जाता है या फिर सीमित रूप में जारी रहता है, लेकिन यह कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वर्तमान फैसले से लगता है कि न्यायालय खेल को अलग रखने की सोच को बढ़ावा दे रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे मुकाबले बिना बाधा के हो सकें। यह स्टोरी दोनों देशों के खेल प्रेमियों को याद दिलाती है कि मैदान पर प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, न कि राजनीतिक द्वेष।
