अंडमान-निकोबार: कांग्रेस की उपेक्षा बनाम मोदी सरकार का विकास विज़न

बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के बीच स्थित अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए ही नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। 572 द्वीपों का यह समूह मलक्का जलडमरूमध्य से सटा है, जहां से दुनिया का लगभग 40 प्रतिशत समुद्री व्यापार गुजरता है। यह वही जलमार्ग है जो एशिया को अफ्रीका, यूरोप और मध्यपूर्व से जोड़ता है। यानी जिसने इस क्षेत्र पर पकड़ बनाई, वही एशियाई समुद्री व्यापार का असली खिलाड़ी बनेगा। लेकिन आज़ादी के बाद सात दशकों तक कांग्रेस सरकारों ने इसे केवल एक पर्यटन स्थल की तरह देखा, जबकि यहां से भारत दुनिया का सबसे बड़ा सामरिक और आर्थिक हब खड़ा कर सकता था।

मोदी सरकार ने इस क्षेत्र की असली ताकत को पहचाना और ग्रेट निकोबार परियोजना के जरिए इसे वैश्विक केंद्र बनाने की ठानी है। 72 से 81 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना के तहत गलाथिया खाड़ी में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनाया जा रहा है, जो हर साल 1.6 करोड़ कंटेनर संभाल सकेगा। यह पोर्ट सिंगापुर और कोलंबो जैसी सुविधाओं का विकल्प बनेगा, जहां फिलहाल भारत अपने निर्यात-आयात का बड़ा हिस्सा उतारता है। अनुमान है कि इस परियोजना से हर साल भारत को 20–25 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत होगी और हजारों करोड़ रुपये की नई कमाई होगी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक टाउनशिप, डिफेंस बेस और पावर प्लांट का निर्माण होगा। नीति आयोग इसकी निगरानी कर रहा है और 2028 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है। इस परियोजना से सीधे करीब 50 हजार रोजगार और अप्रत्यक्ष रूप से डेढ़ लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है।

लेकिन कांग्रेस इस परियोजना को लेकर वही पुराना खेल खेल रही है। सोनिया गांधी ने ‘द हिंदू’ में लेख लिखकर कहा कि यह योजना आदिवासी और पर्यावरण के लिए खतरनाक है। राहुल गांधी ने भी सरकार पर आदिवासी अधिकारों को कुचलने का आरोप लगाया। लेकिन यह वही कांग्रेस है जिसने कभी यहां विकास के नाम पर ठोस कदम नहीं उठाए। 1970 में जब ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का प्रस्ताव आया तो कांग्रेस ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। 1980 में समिति ने पोर्ट मैनेजमेंट बोर्ड बनाने की सिफारिश की, लेकिन उसे भी अनसुना कर दिया गया। 2004 की सुनामी के बाद भी कांग्रेस सरकार ने केवल राहत और पुनर्निर्माण तक खुद को सीमित रखा, कोई बड़ा विज़न सामने नहीं रखा।

सवाल यह है कि अगर कांग्रेस वास्तव में पर्यावरण और आदिवासी हितों की इतनी चिंता करती थी तो इतने सालों तक यहां बुनियादी सुविधाओं का विकास क्यों नहीं किया? क्यों एयरस्ट्रिप, रडार और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी सामरिक ज़रूरतों को पर्यावरण के नाम पर रोका गया? असलियत यह है कि कांग्रेस की नीतियां उपेक्षा और डर पर आधारित थीं।शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों की दुर्दशा बताती है कि असली खतरा विकास नहीं, बल्कि उपेक्षा है। 2001 में शोम्पेन जनजाति की संख्या 300 थी, जो 2011 में घटकर 229 रह गई। 2004 की सुनामी ने इनके गांव उजाड़ दिए। इनकी आबादी लगातार घट रही है। ऐसे में अगर आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और आजीविका नहीं पहुंचेगी तो ये समुदाय खुद ही मिट जाएंगे। मोदी सरकार की योजना इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की है ताकि इन्हें बेहतर जीवन मिले।

कांग्रेस पर्यावरण का मुद्दा उठाती है, लेकिन उदाहरण साफ हैं। जापान हर साल सैकड़ों भूकंप झेलता है, फिर भी दुनिया की सबसे आधुनिक अर्थव्यवस्था है। वहां तकनीक और योजना ने जोखिम को अवसर में बदल दिया। भारत भी यही कर सकता है। ग्रेट निकोबार परियोजना में आधुनिक तकनीक, पर्यावरणीय मानकों और सुरक्षित डिज़ाइन पर जोर दिया गया है।यह परियोजना केवल विकास की नहीं बल्कि सामरिक मजबूती की भी है। हिंद महासागर में चीन लगातार अपनी पकड़ बढ़ा रहा है। ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत वह श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में बंदरगाह विकसित कर भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में ग्रेट निकोबार भारत का सबसे बड़ा जवाब होगा। मलक्का जलडमरूमध्य के पास भारत की पकड़ चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को नई गति देगी और भारत हिंद महासागर क्षेत्र में निर्णायक शक्ति बनेगा।

अगर यह योजना समय पर पूरी होती है तो न केवल भारत का विदेशी व्यापार सशक्त होगा बल्कि हजारों रोजगार पैदा होंगे, पर्यटन और मछली पालन को नई उड़ान मिलेगी और भारत आर्थिक रूप से और आत्मनिर्भर बनेगा। यह केवल एक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं बल्कि 21वीं सदी के भारत की नई ताकत का प्रतीक है।कांग्रेस आज भी वही कर रही है जो उसने दशकों तक किया विकास रोकना और केवल बहाने बनाना। जबकि मोदी सरकार ने यह साबित किया है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। सवाल यह है कि क्या देश कांग्रेस की राजनीति के साथ खड़ा होगा या मोदी सरकार के उस विज़न के साथ जो अंडमान-निकोबार को वैश्विक शक्ति केंद्र बनाने की दिशा में है।

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