संजय सक्सेना,लखनऊ
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मामले में गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग और स्थानीय प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। अखिलेश ने दावा किया है कि जौनपुर, कासगंज और बाराबंकी के जिलाधिकारियों के जवाबों से यह साबित होता है कि निर्वाचन आयोग का यह दावा गलत है कि उन्हें सपा की ओर से कोई शपथपत्र नहीं मिला। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने हाल ही में मीडिया से बातचीत में कहा था कि आयोग को सपा की ओर से कोई शपथपत्र प्राप्त नहीं हुआ। इस बयान के जवाब में अखिलेश ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि अगर शपथपत्र मिले ही नहीं, तो फिर जिलाधिकारी किसके जवाब दे रहे हैं? उनके अनुसार, इन जिलाधिकारियों की अचानक सक्रियता और सतही जवाब इस बात का सबूत हैं कि निर्वाचन आयोग का दावा झूठा है।
अखिलेश ने अपने पोस्ट में आगे कहा कि सपा ने 18,000 शपथपत्र जमा किए थे, जिनमें मतदाता सूची से नाम काटे जाने की शिकायतें थीं। उन्होंने मांग की कि इन जिलाधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, क्योंकि उनके जवाब खानापूर्ति करने वाले प्रतीत होते हैं। अखिलेश ने यह भी आरोप लगाया कि जिन लोगों को सीसीटीवी फुटेज में गलत काम करते पकड़ा गया, उनकी सफाई पर भरोसा करना मुश्किल है। उन्होंने इसे भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का मामला बताते हुए कहा कि झूठ कितना भी ताकतवर दिखे, अंत में वह हारता है। उनके अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार, निर्वाचन आयोग और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत ने लोकतंत्र को कमजोर किया है। उन्होंने इस तिकड़ी को ष्चुनावी तीन तिगाड़ाष् करार देते हुए कहा कि इसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला किया है। अखिलेश ने जोर देकर कहा कि अब जनता इस मामले में अपनी अदालत लगाएगी और सच सामने आएगा।
इस विवाद ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। सपा समर्थक जहां अखिलेश के आरोपों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं जिला अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव पूरी तरह से नियमों के अनुसार और सटीक जानकारी के आधार पर किए गए हैं। उनका दावा है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी थी और इसमें कोई अनियमितता नहीं हुई। दूसरी ओर, अखिलेश और उनकी पार्टी इस मुद्दे पर गहन जांच की मांग कर रहे हैं, ताकि सच सामने आए। यह विवाद न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा रहा है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर भी सवाल उठा रहा है। अखिलेश ने कोर्ट से इस मामले में संज्ञान लेने की अपील की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आखिर सच क्या है और इस मामले में दोषी कौन है।
