मोदी की साइलेंट डिप्लोमेसी ने कैसे बदल दिया मालदीव का ‘इंडिया आउट’ का खेल

संजय सक्सेना,लखनऊ
वरिष्ठ पत्रकार

मालदीव में मोहम्मद मुइज्जू का सत्ता में आना भारत के लिए वही क्षण था, जैसे नेपाल में ओली सरकार का आना या श्रीलंका में राजपक्षे का उभार। चीन की रणनीति साफ थी  हिंद महासागर में भारत की पारंपरिक पकड़ को कमजोर करो, कर्ज-जाल के जरिये छोटे देशों को अपने पाले में खींचो और भारत के सामुद्रिक सुरक्षा घेरे में सेंध लगाओ।मुइज्जू ने जब ‘इंडिया आउट’ का नारा बुलंद किया, तो बीजिंग में बैठे रणनीतिकारों ने इसे बड़ी कामयाबी माना। माले में चीनी बंदरगाह, एयरपोर्ट विस्तार, कृत्रिम द्वीप परियोजना जैसे कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट मुइज्जू के इर्द-गिर्द रखे गए। लेकिन चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ रणनीति की असली हकीकत को मालदीव के अफसरों और जनता ने जल्द समझ लिया। ये कर्ज उतना आसान नहीं था  जितनी तेजी से रकम आती है, उससे दोगुनी शर्तें और ब्याज वापस मांग लिया जाता है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका ताजा उदाहरण था। उसी गलती को माले ने करीब से देखा।

भारत ने क्या किया? भारत ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, कोई बयान नहीं दिया कि चीन का विरोध करेंगे। बस इंतजार किया। नई सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से बधाई दी, मुइज्जू को बताया कि भारत दुश्मन नहीं, जरूरत पड़ने पर सबसे पहले कंधा देने वाला साथी है। जब विदेशी मुद्रा भंडार चुकने को था, तब भारत ने डॉलर स्वैप, आपात लोन, वैक्सीन डिप्लोमेसी जैसे कदम लिए। यही ‘कूटनीति का मौन हथियार’ था।अगर कोई कहे कि ये सिर्फ पैसों की बात है, तो यह अधूरा सच होगा। असली कहानी यह है कि भारत जानता है कि पड़ोसी देश कर्ज लेते हैं, लेकिन भरोसा खरीदना असंभव है। मोदी सरकार ने पिछले दस साल में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ के नाम पर जो नेटवर्क बुना, उसमें सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, हेल्थ और पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें चीन अब भी भारत का विकल्प नहीं बन पाया।माले ने देखा कि चीन के कर्ज से एयरपोर्ट बन सकता है, लेकिन कोविड में चीन दवा, वैक्सीन या राहत लेकर नहीं आया। भारत आया। चीन ने इन्फ्रास्ट्रक्चर का कर्ज दिया लेकिन उसपर काम चीनी कंपनियां करती रहीं, रोजगार चीन को मिला, मालदीव को सिर्फ ईएमआई मिली। भारत ने जो प्रोजेक्ट पकड़ा, उसमें स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिला और साझेदारी में पारदर्शिता भी रही।

आज चीन खुलकर विरोध क्यों नहीं कर रहा? क्योंकि बीजिंग को भी अपनी सीमाएं पता हैं। गलवान के बाद से भारत के साथ टकराव चीन को आर्थिक मोर्चे पर भारी पड़ा। अमेरिका के साथ बढ़ते ट्रेड वॉर के बीच चीन अब दक्षिण एशिया को भारत के खिलाफ मोहरा नहीं बना सकता। उसे दिखाना है कि आरआईसी यानी रूस-भारत-चीन तिकड़ी अभी भी ज़िंदा है। ऐसे में माले में भारत की बढ़ती पकड़ पर चीन खुली प्रतिक्रिया देकर मुइज्जू को शर्मिंदा नहीं करेगा। वो बैक चैनल से काम चलाएगा, लेकिन खुला मोर्चा नहीं खोलेगा माले में विपक्ष, नौकरशाही और यहां तक कि टूरिज्म लॉबी ने मुइज्जू को साफ बता दिया कि अगर भारतीय पर्यटक नाखुश हुए तो मालदीव का पर्यटन खत्म समझो। कोरोना के बाद मालदीव को सबसे ज्यादा रिवेन्यू भारत से ही मिला था। ऐसे में भारत से टकराना आत्मघाती था। रही सही कसर तब पूरी हुई जब चीन की नई डील्स लटकने लगीं  पैसा कागजों में था, जमीन पर नहीं। तब मुइज्जू को समझ आया कि चीन के इशारों पर ‘इंडिया आउट’ बोलने से कुर्सी तो मिल सकती है, लेकिन अर्थव्यवस्था नहीं चल सकती।

अब भारत की 4850 करोड़ रुपये की नई मदद सीधे सोशल हाउसिंग, कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य और एजुकेशन में लगेगी  ये वो क्षेत्र हैं जहां जनता को फौरन फायदा दिखेगा। यूपीआई और रुपे को माले में लागू करने से भारतीय पर्यटकों को आसानी होगी, और मालदीव के राजस्व में पारदर्शिता आएगी। रक्षा सहयोग से मालदीव की कोस्टल सिक्योरिटी मजबूत होगी। यानी अब मालदीव एक ही तीर से दो निशाने साध रहा है   चीन से कर्ज के जाल से निकलने का रास्ता और भारत के भरोसे से विकास का इंजन। ये सिर्फ माले और दिल्ली के बीच की कहानी नहीं।

यह आने वाले दशक में भारत की दक्षिण एशियाई नीति का ब्लूप्रिंट है। श्रीलंका में भी यही देखा गया, नेपाल में भी यही होगा। पाकिस्तान अगर कभी व्यवहारिक रास्ते पर लौटे तो वहां भी यही मॉडल लागू होगा। बिना गोली, बिना टकराव, बिना धमकी  पड़ोसी को भरोसा दो, संकट में साथ दो और दिखाओ कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मतलब सिर्फ बातें नहीं, मदद और साझेदारी है।मालदीव में आज जो हुआ वो हिंद महासागर में भारत की वापसी नहीं, बल्कि उसके ‘अजेय होने’ का संकेत है। चीन चाहे जितना कर्ज फेंके, लेकिन भरोसा न तो उधार लिया जा सकता है, न गिरवी रखा जा सकता है। यह भरोसा ही मोदी की साइलेंट डिप्लोमेसी का सबसे बड़ा हथियार है  और माले इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

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