जिस देश की संसद से लेकर सड़क तक, हर जगह बहसें हो रही हों कि बेरोज़गारी कैसे रुकेगी, किसानों की आय कैसे बढ़ेगी, महंगाई क्यों थमेगी उस देश में कुछ लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि ग़ाज़ा में बम क्यों गिर रहे हैं और उसके लिए भारत में जुलूस कब निकलेगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने ताज़ा फैसले से इस पूरे विमर्श को जिस तरह झकझोरा है, उसे केवल एक कानूनी आदेश मान लेना भूल होगी। यह फैसला दरअसल उस राजनीतिक और वैचारिक सोच पर करारी चोट है, जो अपने घर की दीवारें गिरती देखता है लेकिन दूर की जंग पर मोमबत्ती जुलूस निकालने को तैयार रहता है।ग़ाज़ा में क्या हो रहा है, यह अब किसी से छुपा नहीं। वहां एक ओर हमास का आतंक है, दूसरी तरफ़ इज़रायल की सख़्त कार्रवाई लेकिन यह लड़ाई भारत में क्यों लड़ी जाए? मुंबई के आज़ाद मैदान में प्रदर्शन के लिए इजाज़त मांगने वाले नेता खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी के सबसे बड़े झंडाबरदार बताते हैं, लेकिन अदालत ने याद दिला दिया कि इस आज़ादी की भी एक सीमा है। सीमा यह कि जब कोई आंदोलन देश के कूटनीतिक हितों को चोट पहुंचाए, तो अदालत चुप नहीं बैठ सकती।
कहने को प्रदर्शन करना लोकतंत्र में हक़ है। लेकिन वही लोकतंत्र यह भी कहता है कि हक़ के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अदालत ने ठीक इसी जिम्मेदारी की याद दिलाई जब जज ने कहा कि पहले अपने देश के मुद्दों पर बोलिए। ट्रैफिक की समस्या, कचरे के ढेर, बाढ़ में डूबते शहर, बेरोज़गारी, किसान आत्महत्याएं क्या इन पर आंदोलन के लिए कोई नेता अदालत आता है? क्यों देश के भीतर के सवालों को उठाना कमज़ोरी माना जाता है और ग़ाज़ा जैसे विदेशी मुद्दे पर भाषण देना ही क्रांतिकारी होना रह गया है?ग़ाज़ा प्रेम कोई नई बात नहीं है। देश में वामपंथी राजनीति की पूरी नस-नस में यह विदेश केंद्रित रोमांस भरा रहा है। कभी मॉस्को के इशारे पर नीतियां बदलती थीं, कभी चीन की तारीफ में नारे लगते थे। लेकिन समय बदला, जनता ने यह सब नकार दिया। यही वजह है कि संसद में किसी दौर में चालीस सीटें जीतने वाली पार्टियां अब पाँच सीट पर सिमट गई हैं। पर यह समझने के बजाय आज भी वही पुराना फार्मूला अपनाया जा रहा है देश के असली मुद्दों को छोड़ दो, विदेश के झंडे उठा लो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे प्रदर्शनों से भारत की विदेश नीति को नुकसान हो सकता है। यह कोई मामूली चेतावनी नहीं है। भारत आज अपने दम पर पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका निभा रहा है। भारत के इज़रायल से रिश्ते मज़बूत हुए हैं तो फिलिस्तीन के लोगों के अधिकारों का भी हमेशा समर्थन रहा है मगर भारत यह संतुलन सिर्फ सड़कों पर नारे लगाकर नहीं साधता। इसके लिए वर्षों की कूटनीति, शांत वार्ता और संतुलित बयानबाज़ी चाहिए न कि भीड़तंत्र।यह भी गौर करने लायक है कि जिन देशों के नाम पर ये प्रदर्शन होते हैं, वहां के हालात क्या हैं। अरब दुनिया भी ग़ाज़ा के मामले में चुप है। बड़े मुस्लिम राष्ट्र कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं कर रहे, न क़तर, न सऊदी अरब, न जॉर्डन। वहां की सरकारें भी चाहती हैं कि मामला बातचीत से सुलझे। लेकिन भारत में बैठे कुछ लोग अपनी सियासी रोटी सेंकने के लिए ग़ाज़ा प्रेम का ढोल पीटते रहते हैं। जब अदालत कहती है कि यह अदूरदर्शिता है, तो यह सच्चाई को ही आईना दिखाना है।
यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी है कि जिन हाथों में ग़ाज़ा का झंडा है, उन्हीं के हाथ कभी कश्मीरी पंडितों के पलायन पर मोमबत्ती नहीं जलाते। पहलगाम में धर्म पूछ कर मारे गए तीर्थयात्रियों के लिए कोई पोस्टर नहीं छपता। पुलवामा में शहीद जवानों के परिवारों के लिए कभी सड़क पर भीड़ नहीं उतरती। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है? यही दोहरापन हाईकोर्ट ने पकड़ा। यही वजह है कि अदालत की टिप्पणी सिर्फ सीपीएम की याचिका पर नहीं है यह उस पूरी राजनीति पर सवाल है, जो अपने घर को अंधेरे में छोड़कर दूसरों के आंगन में दीप जलाने का दिखावा करती है।इस फैसले ने एक बार फिर याद दिलाया है कि अदालतें सिर्फ विवाद सुलझाने के लिए नहीं होतीं। कभी-कभी वह पूरे समाज को आईना दिखा देती हैं। इस बार वही हुआ। अब सवाल उन नेताओं और संगठनों का है कि क्या वे इस कटु सच को स्वीकार करेंगे या फिर हर बार की तरह इसे ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला’ बताकर नई साजिश की कहानी बनाएंगे?
असल में इस फैसले से सबक हर दल को लेना चाहिए। देश को सड़कों पर उतरना ही है तो बेरोज़गार नौजवानों के लिए उतरिए। किसान की आत्महत्या रोकने के लिए आवाज़ उठाइए। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था सुधरे, इसके लिए आंदोलन कीजिए। बाढ़ से हर साल बेहाल होते राज्यों में राहत की मॉनिटरिंग करिए। लेकिन यह सब काम मुश्किल हैं, क्योंकि इनसे वोट सीधे नहीं मिलते, कोई विदेश से तालियाँ नहीं बजाता। ग़ाज़ा का मुद्दा आसान है विदेशी जुलूस है, अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में तस्वीर छप जाती है, किसी यूनिवर्सिटी में भाषण हो जाता है और वही पांच सीट जीतने की खुराक तैयार हो जाती है।अदालत ने अब यह खुराक छीनने का पहला कदम उठाया है। कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। आने वाले दिनों में यह फ़ैसला नज़ीर बनेगा। कोई नया याचिकाकर्ता जब फिर किसी विदेशी विवाद पर प्रदर्शन की मांग लेकर कोर्ट पहुंचेगा, तो यही फैसला उसके सामने होगा पहले देश, फिर विदेश।
यह भी ध्यान देने की बात है कि अदालतों के भरोसे ही सब कुछ नहीं छोड़ा जा सकता। समाज को भी तय करना होगा कि वह किसे अपना नेता मानेगा जो अपने मोहल्ले की बदहाल सड़क पर ख़ामोश है लेकिन ग़ाज़ा के लिए माइक लेकर खड़ा है, या जो गांव की चौपाल में बिजली, पानी, सड़क और रोजगार के लिए प्रशासन से लड़े? जनता का विवेक ही ऐसी दिखावटी राजनीति को असली सबक सिखाता है। अदालत ने तो बस रास्ता दिखाया है।इसलिए आज जब हम इस फ़ैसले को पढ़ते हैं, तो इसे सिर्फ सीपीएम की हार मत मानिए। इसे एक चेतावनी मानिए कि देश के मुद्दों से भागकर विदेश का झंडा उठाना अब आसान नहीं होगा। अब लोग भी पूछेंगे और अदालत भी। यही लोकतंत्र की असली परिपक्वता है और यही देश के भविष्य की उम्मीद भी।
