ठाकरे-फडणवीस की नजदीकियों से बढ़ी शिंदे की मुश्किलें, महाराष्ट्र में सियासी समीकरण बदलने के संकेत

महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों हलचल अपने चरम पर है। कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे शिवसेना (UBT) के नेता उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच बढ़ती नजदीकियां, आदित्य ठाकरे की फडणवीस से मुलाकातें, और महाविकास आघाड़ी (MVA) से उद्धव का मोहभंग ये सारे घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप और बीजेपी के साथ तनाव ने सियासी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। क्या महाराष्ट्र में बिहार जैसा सियासी खेल शुरू हो चुका है, जहां चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस जैसे समीकरण देखने को मिले? आइए, इस सियासी ड्रामे की गहराई में उतरकर समझते हैं कि आखिर माजरा क्या है।

पिछले कुछ महीनों से महाराष्ट्र की राजनीति में उथल-पुथल का दौर चल रहा है। 2024 के विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन (बीजेपी, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की NCP) ने 288 में से 230 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) केवल 20 सीटों पर सिमट गई। यह हार MVA के लिए करारा झटका थी, जिसमें उद्धव की पार्टी के साथ कांग्रेस और शरद पवार की NCP (SP) शामिल हैं। इस हार ने उद्धव ठाकरे को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। शिवसेना (UBT) के मुखपत्र ‘सामना’ में उद्धव ने खुलकर MVA के सहयोगियों पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में MVA ने 48 में से 30 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में सहयोगी दलों का निजी स्वार्थ और अहंकार हार का कारण बना। उद्धव ने चेतावनी भी दी कि अगर भविष्य में ऐसी गलतियां दोहराई गईं, तो गठबंधन में रहने का कोई मतलब नहीं होगा। यह बयान साफ तौर पर MVA के भविष्य पर सवाल उठाता है।

इसी बीच, देवेंद्र फडणवीस और ठाकरे परिवार के बीच बढ़ती नजदीकियों ने सियासी हलचल को और तेज कर दिया है। जुलाई 2025 में उद्धव ठाकरे और फडणवीस की विधान परिषद के सभापति राम शिंदे के कक्ष में 20 मिनट की मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात को औपचारिकता का नाम दिया गया, लेकिन इसके पीछे की रणनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके बाद 19 जुलाई को मुंबई के बीकेसी स्थित सोफिटेल होटल में आदित्य ठाकरे और फडणवीस की दूसरी मुलाकात ने सियासी गलियारों में तूफान ला दिया। खबरों के मुताबिक, दोनों नेता इस होटल में साढ़े चार घंटे तक मौजूद रहे। हालांकि, मुलाकात की अवधि को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन आदित्य ठाकरे के बयान ने इस मुलाकात को गंभीर बना दिया। आदित्य ने कहा, “हम मुलाकात की खबर सुन रहे हैं… अब खबर देखने के बाद एक व्यक्ति अपने गांव जाएगा… जो चल रहा है उसे चलने दें।” यह बयान भले ही किसी का नाम न ले, लेकिन इसका निशाना साफ तौर पर एकनाथ शिंदे की ओर था।

दरअसल, एकनाथ शिंदे और बीजेपी के बीच तनाव की खबरें कोई नई नहीं हैं। 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद शिंदे को मुख्यमंत्री पद से हटाकर फडणवीस को यह कुर्सी सौंपी गई थी। शिंदे को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनकी नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी उनकी स्थिति को कमजोर किया है। कुछ मंत्रियों के घरों से नोटों के बंडल बरामद होने और उनके परिवार के कारोबार पर पुलिस कार्रवाई की खबरों ने शिंदे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बीजेपी के लिए शिंदे अब एक बोझ की तरह नजर आ रहे हैं, और ठाकरे परिवार के साथ बढ़ती नजदीकियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि बीजेपी शिंदे को साइडलाइन करने की रणनीति पर काम कर रही है।

यह स्थिति बिहार की सियासत से मिलती-जुलती है, जहां चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के बीच बीजेपी ने अपने हितों के लिए समीकरण बदले। बिहार में बीजेपी ने पहले पशुपति पारस को समर्थन दिया, लेकिन बाद में चिराग पासवान को अपने साथ लिया। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही कुछ होता दिख रहा है। उद्धव ठाकरे को लगता है कि MVA के साथ 2029 तक सत्ता में वापसी की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में बीजेपी के साथ नजदीकी उनके लिए एक रणनीतिक कदम हो सकता है। खासकर तब, जब फडणवीस ने उन्हें सत्ता पक्ष में शामिल होने का ऑफर दिया हो। यह ऑफर न केवल उद्धव को सत्ता के करीब ला सकता है, बल्कि उनके जानी दुश्मन एकनाथ शिंदे को भी सियासी तौर पर कमजोर कर सकता है।

फडणवीस की रणनीति भी इस खेल में अहम भूमिका निभा रही है। वह मराठी वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ठाकरे परिवार के साथ संवाद बढ़ा रहे हैं। राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के साथ उनकी मुलाकातें इस बात का संकेत हैं कि बीजेपी मराठी अस्मिता के मुद्दे को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। मराठी अस्मिता का मुद्दा महाराष्ट्र की सियासत में हमेशा से अहम रहा है, और हाल ही में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के एक मंच पर आने से यह मुद्दा फिर से गरमा गया है। अगर ठाकरे परिवार बीजेपी के साथ आता है, तो यह मराठी वोटों को एकजुट करने में मददगार हो सकता है, जो बीजेपी के लिए बड़ा फायदा होगा।

वहीं, MVA के लिए यह स्थिति एक बड़े संकट की तरह है। उद्धव ठाकरे का गठबंधन से मोहभंग और बीजेपी के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियां कांग्रेस और शरद पवार की NCP के लिए खतरे की घंटी हैं। शरद पवार और अजित पवार के बीच भी सुलह की अटकलें चल रही हैं, जो MVA को और कमजोर कर सकती हैं। अगर उद्धव ठाकरे बीजेपी के साथ चले जाते हैं, तो यह MVA के लिए करारा झटका होगा। विपक्षी गठबंधन पहले ही 2024 के विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के कारण आलोचनाओं का सामना कर रहा है।

इस सियासी ड्रामे में आदित्य ठाकरे की भूमिका भी अहम हो गई है। उनकी फडणवीस के साथ मुलाकात और उनके बयान साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि शिवसेना (UBT) अब नई राह पर चलने को तैयार है। आदित्य की युवा छवि और सक्रियता बीजेपी के लिए भी आकर्षक हो सकती है, खासकर मराठी युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए।

कुल मिलाकर, महाराष्ट्र की सियासत में यह नया मोड़ कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या उद्धव ठाकरे और बीजेपी के बीच नया गठजोड़ बनने जा रहा है? क्या एकनाथ शिंदे को बीजेपी साइडलाइन कर देगी, जैसा कि बिहार में पशुपति पारस के साथ हुआ? और क्या MVA का अस्तित्व खतरे में है? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ होंगे, लेकिन इतना तय है कि महाराष्ट्र की सियासत में अभी और ड्रामे बाकी हैं। फिलहाल, सियासी गलियारों में हर कोई इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है कि क्या यह सिर्फ ट्रेलर है, या पूरी फिल्म शुरू हो चुकी है?

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