यूपी में योगी-चौधरी के सहारे जातीय संतुलन साधने की तैयारी

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार मार्च 2026 में अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल पूरे कर लेगी है,लेकिन अभी तक जनता के बीच योगी सरकार के लिये किसी भी तरह की सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दे रही है। सरकार को अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था और आधारभूत संरचना के विकास जैसे विषयों पर जनता का समर्थन बना हुआ है। यह बात हवा हवाई नहीं सर्वेक्षण और प्रतिपुष्टि के आधार पर कही जाती है। फिर भी, बीजेपी आलाकमान और सीएम योगी आदित्यनाथ जनाधार बढ़ाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए मात्र सवा वर्ष शेष हैं। पार्टी के उच्च नेतृत्व से लेकर प्रांत स्तर तक कमजोर कड़ियों की जांच चल रही है। मुख्य केंद्र बिंदु जातीय संतुलन को मजबूत करने पर है। पूर्व से पश्चिम, बुंदेलखंड से अवध तक सभी प्रमुख बिरादरियों को पार्टी और सरकार में स्थान देकर मत बैंक को एकजुट करना। इसी क्रम में नई प्रांत कार्यकारिणी का गठन और योगी मंत्रिमंडल का विस्तार चर्चा में है, जो खरमास (देवउठनी एकादशी, नवंबर 2025 के बाद) के बाद संभव माना जा रहा है।
यह रणनीतिक बदलाव भाजपा की पारंपरिक चुनावी तैयारी का हिस्सा होगा। 2022 के विधानसभा चुनावों में योगी सरकार ने 255 सीटें प्राप्त कीं, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) ने पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक सूत्र से चुनौती दी। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश में केवल 33 सीटें मिलीं (पहले 62 से कम), जो चेतावनी का संकेत था। पार्टी समझती है कि राज्य की 80 लोकसभा सीटों में जाति निर्णायक भूमिका निभाती है। ब्राह्मण (10 प्रतिशत), ठाकुर (8 प्रतिशत), दलित (21 प्रतिशत), यादव (8 प्रतिशत), कुर्मी (4 प्रतिशत) और अन्य पिछड़ी जाति समूहों का समर्थन बनाए रखना आवश्यक है। नया प्रांत अध्यक्ष पंकज चौधरी (गोरखपुर से सांसद, कुर्मी समुदाय) इसी उद्देश्य से चुने गए। वे योगी के निकट सहयोगी हैं और संगठन को सशक्त बनाने का दायित्व संभालेंगे। उनकी कार्यकारिणी में विभिन्न जातियों के नेताओं को स्थान देकर आधार विस्तार होगा।
गौरतलब हो, उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति पर आधारित है। भाजपा ने 2017 और 2022 में ठाकुर-ब्राह्मण गठबंधन के साथ गैर-यादवी पिछड़ी जातियों, दलितों और कुछ मुस्लिम मतों को जोड़ा। लेकिन 2024 में सपा-बसपा गठबंधन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, मुस्लिम और दलित मतों को काटा। पूर्वांचल में कुशवाहा, निषाद और राजभर असंतुष्ट दिखे। बुंदेलखंड में लोधी और निषाद बिरादरियां उपेक्षित रहीं। अवध क्षेत्र में शाक्य, मौर्य और जाटव समुदायों का समर्थन कमजोर पड़ा। पार्टी इन कमजोरियों को दूर करने पर तत्पर है।

पंकज सिंह की कार्यकारिणी में पूर्वांचल से राजभर, कुशवाहा और निषाद जाति के नेताओं को प्रमुख पद मिल सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और गुर्जर नेताओं को, बुंदेलखंड से लोधी,अवध से शाक्य-मौर्य को शामिल कर संतुलन साधा जाएगा। यह न केवल संगठन को मजबूत करेगा, बल्कि चुनावी तैयारियों में स्थानीय नेताओं को सक्रिय बनाएगा। विश्लेषकों का मत है कि कार्यकारिणी का विस्तार 300-400 सदस्यों तक हो सकता है, जिसमें 40 प्रतिशत नए चेहरे होंगे।
योगी मंत्रिमंडल का विस्तार भी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। मंत्रिमंडल में 60 मंत्रियों की नियुक्ति हो सकती है,लेकिन अभी तक मात्र 52 मंत्री ही हैं। इस लिये करीब छह मंत्री और बन सकते हैं। इस समय योगी सरकार में ठाकुर और ब्राह्मण नेताआंे का वर्चस्व है, जबकि कुर्मी, लोधी और निषाद जाति का प्रतिनिधित्व काफी कम हैं। चर्चा है कि 8-10 नए मंत्रियों को स्थान देकर उक्त बिरादरियों को संतुष्ट किया जाए। वहीं कुछ को बिना विभाग वाले मंत्री (स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री) बनाकर भी संतुष्ट किया जा सकता है। संभावित नामों में पूर्वांचल से अनिल राजभर, पश्चिम से जाट नेता दलीप सिंह भदाना, बुंदेलखंड से लोधी विधायक। वहीं महिलाओं और युवाओं जैसे अपर्णा यादव (यादव बिरादरी से) या जया पाल को भी सरकार में जगह मिल सकती है।

पिछले विस्तारों पर दृष्टि डालें। 2017 में 47 सदस्यों वाला मंडल 2021 में 60 पर पहुंचा। इसमें निषादराज (मुख्यमंत्री के निकट सहयोगी) को स्थान मिला। 2024 लोकसभा हार के बाद संगठन बदला गया। स्वतंत्र देव सिंह को हटाकर पंकज सिंह लाए गए। यह योगी को सशक्त करता है। जातीय संतुलन में भी परिवर्तन आया है। 2014 में ब्राह्मण-ठाकुर 40 प्रतिशत मंत्रिमंडल में थे, विश्लेषक कहते हैं, यह उपचुनावों (2026 में 10 से अधिक सीटें) की तैयारी भी है। घोसी, मीरापुर जैसे क्षेत्रों में निषाद-मुस्लिम मत भाजपा के लिए चुनौती। नई कार्यकारिणी बूथ स्तर तक मजबूती लाएगी। योगी का ’बुलडोजर बाबा’ छवि बरकरार रखते हुए समावेशी रूप बनाना रणनीति का केंद्र है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार मार्च 2026 में अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल पूरे कर लेगी है,लेकिन अभी तक जनता के बीच योगी सरकार के लिये किसी भी तरह की सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दे रही है। सरकार को अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था और आधारभूत संरचना के विकास जैसे विषयों पर जनता का समर्थन बना हुआ है। यह बात हवा हवाई नहीं सर्वेक्षण और प्रतिपुष्टि के आधार पर कही जाती है। फिर भी, बीजेपी आलाकमान और सीएम योगी आदित्यनाथ जनाधार बढ़ाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए मात्र सवा वर्ष शेष हैं। पार्टी के उच्च नेतृत्व से लेकर प्रांत स्तर तक कमजोर कड़ियों की जांच चल रही है। मुख्य केंद्र बिंदु जातीय संतुलन को मजबूत करने पर है। पूर्व से पश्चिम, बुंदेलखंड से अवध तक सभी प्रमुख बिरादरियों को पार्टी और सरकार में स्थान देकर मत बैंक को एकजुट करना। इसी क्रम में नई प्रांत कार्यकारिणी का गठन और योगी मंत्रिमंडल का विस्तार चर्चा में है, जो खरमास (देवउठनी एकादशी, नवंबर 2025 के बाद) के बाद संभव माना जा रहा है।
यह रणनीतिक बदलाव भाजपा की पारंपरिक चुनावी तैयारी का हिस्सा होगा। 2022 के विधानसभा चुनावों में योगी सरकार ने 255 सीटें प्राप्त कीं, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) ने पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक सूत्र से चुनौती दी। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश में केवल 33 सीटें मिलीं (पहले 62 से कम), जो चेतावनी का संकेत था। पार्टी समझती है कि राज्य की 80 लोकसभा सीटों में जाति निर्णायक भूमिका निभाती है। ब्राह्मण (10 प्रतिशत), ठाकुर (8 प्रतिशत), दलित (21 प्रतिशत), यादव (8 प्रतिशत), कुर्मी (4 प्रतिशत) और अन्य पिछड़ी जाति समूहों का समर्थन बनाए रखना आवश्यक है। नया प्रांत अध्यक्ष पंकज चौधरी (गोरखपुर से सांसद, कुर्मी समुदाय) इसी उद्देश्य से चुने गए। वे योगी के निकट सहयोगी हैं और संगठन को सशक्त बनाने का दायित्व संभालेंगे। उनकी कार्यकारिणी में विभिन्न जातियों के नेताओं को स्थान देकर आधार विस्तार होगा।
गौरतलब हो, उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति पर आधारित है। भाजपा ने 2017 और 2022 में ठाकुर-ब्राह्मण गठबंधन के साथ गैर-यादवी पिछड़ी जातियों, दलितों और कुछ मुस्लिम मतों को जोड़ा। लेकिन 2024 में सपा-बसपा गठबंधन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, मुस्लिम और दलित मतों को काटा। पूर्वांचल में कुशवाहा, निषाद और राजभर असंतुष्ट दिखे। बुंदेलखंड में लोधी और निषाद बिरादरियां उपेक्षित रहीं। अवध क्षेत्र में शाक्य, मौर्य और जाटव समुदायों का समर्थन कमजोर पड़ा। पार्टी इन कमजोरियों को दूर करने पर तत्पर है।

पंकज सिंह की कार्यकारिणी में पूर्वांचल से राजभर, कुशवाहा और निषाद जाति के नेताओं को प्रमुख पद मिल सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और गुर्जर नेताओं को, बुंदेलखंड से लोधी,अवध से शाक्य-मौर्य को शामिल कर संतुलन साधा जाएगा। यह न केवल संगठन को मजबूत करेगा, बल्कि चुनावी तैयारियों में स्थानीय नेताओं को सक्रिय बनाएगा। विश्लेषकों का मत है कि कार्यकारिणी का विस्तार 300-400 सदस्यों तक हो सकता है, जिसमें 40 प्रतिशत नए चेहरे होंगे।
योगी मंत्रिमंडल का विस्तार भी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। मंत्रिमंडल में 60 मंत्रियों की नियुक्ति हो सकती है,लेकिन अभी तक मात्र 52 मंत्री ही हैं। इस लिये करीब छह मंत्री और बन सकते हैं। इस समय योगी सरकार में ठाकुर और ब्राह्मण नेताआंे का वर्चस्व है, जबकि कुर्मी, लोधी और निषाद जाति का प्रतिनिधित्व काफी कम हैं। चर्चा है कि 8-10 नए मंत्रियों को स्थान देकर उक्त बिरादरियों को संतुष्ट किया जाए। वहीं कुछ को बिना विभाग वाले मंत्री (स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री) बनाकर भी संतुष्ट किया जा सकता है। संभावित नामों में पूर्वांचल से अनिल राजभर, पश्चिम से जाट नेता दलीप सिंह भदाना, बुंदेलखंड से लोधी विधायक। वहीं महिलाओं और युवाओं जैसे अपर्णा यादव (यादव बिरादरी से) या जया पाल को भी सरकार में जगह मिल सकती है।

पिछले विस्तारों पर दृष्टि डालें। 2017 में 47 सदस्यों वाला मंडल 2021 में 60 पर पहुंचा। इसमें निषादराज (मुख्यमंत्री के निकट सहयोगी) को स्थान मिला। 2024 लोकसभा हार के बाद संगठन बदला गया। स्वतंत्र देव सिंह को हटाकर पंकज सिंह लाए गए। यह योगी को सशक्त करता है। जातीय संतुलन में भी परिवर्तन आया है। 2014 में ब्राह्मण-ठाकुर 40 प्रतिशत मंत्रिमंडल में थे, विश्लेषक कहते हैं, यह उपचुनावों (2026 में 10 से अधिक सीटें) की तैयारी भी है। घोसी, मीरापुर जैसे क्षेत्रों में निषाद-मुस्लिम मत भाजपा के लिए चुनौती। नई कार्यकारिणी बूथ स्तर तक मजबूती लाएगी। योगी का ’बुलडोजर बाबा’ छवि बरकरार रखते हुए समावेशी रूप बनाना रणनीति का केंद्र है।

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